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सब्र आधा ईमान है

(डाक्टर अब्दुल करीम)सब्र उन मामलात में से है जो इस्लाम में फर्ज हैं। सब्र आधा ईमान है। कुरआने करीम ने अस्सी मकामात पर इसका ज़िक्र किया है। कहीं इसका हुक्म दिया गया है-‘‘ सब्र और नमाज से मदद लो।’’ (अल बकरा-2.45) और कहीं इसकी खिलाफवर्जी से

(डाक्टर अब्दुल करीम)सब्र उन मामलात में से है जो इस्लाम में फर्ज हैं। सब्र आधा ईमान है। कुरआने करीम ने अस्सी मकामात पर इसका ज़िक्र किया है। कहीं इसका हुक्म दिया गया है-‘‘ सब्र और नमाज से मदद लो।’’ (अल बकरा-2.45) और कहीं इसकी खिलाफवर्जी से मना किया गया है, जैसे -‘‘पस ऐ नबी! सब्र करो जिस तरह रसूलों ने सब्र किया है और उनके मामले में जल्दी न करो।’’ (अल हिकाफ-35.46) कहीं साबिर के साथ मोहब्बत का इजहार किया गया है, जैसे -‘‘ अल्लाह तआला साबिरों को पसंद करता है।’’(आले इमरान-3.14)

कहीं यह बात की गई है कि अल्लाह तआला साबिर लोगो का साथी है, जैसे -‘‘ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, सब्र और नमाज से मदद करो।’’ (अल बकरा-2.153) कहीं यह बात बताई गई है कि साबिर लोगो अंजाम भला होगा – जैसे ‘‘अगर तुम सब्र करो तो यह तुम्हारे लिए बेहतर है।’’ (अल निसा-4.25) कहीं यह जिक्र है कि उन लोगों को अज्रे अजीम से नवाजा जाएगा जैसे -‘‘ सब्र करने वालों को तो उनका अज्र बेहिसाब दिया जाएगा।’’ (अल जमर-10.39) कहीं यह जिक्र है कि साबिरीन अल्लाह तआला की निशानियों और नसीहतों से नफा हासिल करते हैं, जैसे-‘‘ इन वाक्यात में बड़ी निशानियां है हर उस फर्द के लिए जो सब्र और शुक्र करने वाला हो।’’

(इब्राहीम-5.14) कहीं यह फरमाया गया है कि यह जन्नत में दाखिल होने का सबब है जैसे -‘‘तुम पर सलामती हो तुमने दुनिया में जिस तरह सब्र से काम लिया और उसकी बदौलत आज तुम इसके मुस्तहक हुए हो।’’ (अल राद-13.24)

इसके अलावा सब्र व यकीन के साथ अमानत फिद्दीन मयस्सर होता है-‘‘ और जब उन्होंने सब्र किया और हमारी आयतों पर यकीन लाते रहे तो उनके अन्दर हम ने ऐसे पेशवा पैदा किए जो हमारे हुक्म से रहनुमाई करते थे।’’ (अल सजदा-24.32) यह उन आयतो में से चंद हैं जो कुरआने करीम में सब्र के हवाले से वारिद हैं।

सुन्नते नबवी में भी सब्र के बारे में बहुत सी हदीसे हैं। उनमें से चंद इस तरह है। ‘‘ किसी ने किसी को सब्र से ज्यादा बेहतर और इससे कुशादा अतिया नहीं दिया।’’

‘‘मोमिन का मामला भी अजीब है। उसके लिए तो खैर ही खैर है। यह चीज मोमिन के सिवा किसी और के हिस्से में नहीं आई। अगर उसे खुशी हासिल होती है तो शुक्र करता है, यह उसके लिए खैर है। और अगर उसे तकलीफ पहुंचती है तो सब्र करता है और यह भी उसके लिए खैर है।’’ सब्र के लुुगवी मायनी रोकना और बाज रखना है।

शरीअत की इस्तलाह में सब्र की तीन किस्में हैं। एक अल्लाह तआला की इताअत पर सब्र।
दूसरी, अल्लाह की नाफरमानी से सब्र
और तीसरी मुसीबत व मुश्किलात पर सब्र।

अल्लाह तआला की इताअत पर सब्र यह है कि आदमी हमेशा इसकी पाबंदी करे। इसके बारे में अखलाक से काम ले और इसको शरीयत के तकाजों के मुताबिक अंजाम दे। इसमें जो चीज मददगार साबित हो सकती है वह यह है कि आदमी अल्लाह तआला की मारफत हासिल करे और बंदो पर उसके हुकूक को पहचान ले और यह भी मालूम हुआ कि जो लोग अल्लाह तआला की इताअत करते हैं उनको अल्लाह तआला बेहतर बदला अता फरमाता है।

अल्लाह तआला की नाफरमानी के कामों से सब्र यह कि बुराइयों को छोड़ दिया जाए और गुनाहों से दूर रहा जाए। और साबिर मुसलसल उनसे दूर रहे और राहे फरार अख्तियार किए रहे। इस सब्र के हुसूल में जो चीज मआविन साबित होती है वह यह है कि अल्लाह तआला का अजाब आदमी के दिल में हर वक्त बाकी रहे।

इस इस्तहजार का आला दर्जा यह है कि इंसान अल्लाह तआला से हया करे और उसके साथ मोहब्बत रखे। इसके अलावा सब्र के समरात को मुस्तहजर रखना भी इसमें मददगार साबित हो सकता है। सब्र के समरात में एक यह है कि आदमी का ईमान बरकरार रहेगा, उसे तकवियत हासिल होगी और उसमें इजाफा होगा।

क्योंकि गुनाह या तो ईमान को खत्म कर देते हैं या उसे कमजोर बना देते हैं या उसे गंदा करके उसके नूर और खुशनुमाई को खत्म कर देते हैं।

मुसीबत व मुश्किलात पर सब्र इस तरह होता है कि मुश्किलात को बरदाश्त किया जाए, उस पर नाराजगी को तर्क किया जाए और लोगों से कोई शिकवा शिकायत न की जाए। इसलिए कि मखलूक से शिकायत सब्र जमील के मनाफी है। अलबत्ता अल्लाह तआला के यहां शिकवा सब्र के मनाफी नहीं है।

अल्लाह तआला ने हजरत याकूब (अलै0) के बारे में फरमाया-‘‘ उसने कहा- मैं अपनी परेशानी और अपने गम की फरियाद अल्लाह के सिवा किसी से नहीं करता।’’ (यूसुफ 12.86) और हजरत अयूब (अलै0) के बारे में फरमाया- ‘‘याद करो जब कि उसने अपने रब को पुकारा कि मुझे बीमारी लग गई है और तू रहम करने वाला है।’’ (अल अंबिया-21.83) उनके बारे में एक और जगह फरमाया-‘‘ हमने उसे साबिर पाया, बेहतरीन बंदा अपने रब की तरफ बहुत रूजूअ करने वाला।’’

इस सब्र के लिए दाई अल्लाह की उन नेमतों का इस्तहजार करे जिन का हिसाब और गिनती मुश्किल है। इस तरह मुसीबतजदा के लिए इस मुसीबत को बरदाश्त करना आसान होता है और उसका बोझ हल्का हो जाता है। इसकी मिसाल ऐसी होती है जैसे एक आदमी को दो हजार रूपए दिए जाएं और उनमें से एक पैसा उससे गुम हो जाए। मुसीबत पर सब्र के लिए यह बात मददगार साबित होती है कि आदमी साबिरीन के अजीम अज्र को जेहन में लाए।

—————बशुक्रिया: जदीद मरकज़

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