Thursday , September 20 2018

सरकारी मुलाज़मीन को जुर्रत मंदाना फ़ैसले करने की तरग़ीब

हुकूमत में पालिसी साज़ी मफ़लूज हो जाने के इल्ज़ामात का सामना कर रहे वज़ीर-ए-आज़म डाक्टर मनमोहन सिंह ने आज सियोल सरवेंटस (सरकारी मुलाज़मीन) से ख़ाहिश की है कि वो फ़ैसला साज़ी में जुर्रत मंदी का मुज़ाहरा करें। उन्होंने यक़ीन दहानी कराई कि कर

हुकूमत में पालिसी साज़ी मफ़लूज हो जाने के इल्ज़ामात का सामना कर रहे वज़ीर-ए-आज़म डाक्टर मनमोहन सिंह ने आज सियोल सरवेंटस (सरकारी मुलाज़मीन) से ख़ाहिश की है कि वो फ़ैसला साज़ी में जुर्रत मंदी का मुज़ाहरा करें। उन्होंने यक़ीन दहानी कराई कि करप्शन से मुक़ाबला के नाम पर टाल मटोल की पालिसी इख्तेयार नहीं की जाएगी।

सियोल सर्विसेस डे के मौक़ा पर ख़िताब करते हुए डाक्टर मनमोहन सिंह ने ब्यूरोक्रेट्स से ख़ाहिश की कि वो फ़ैसला साज़ी के मुआमले में जुर्रत मंदी का मुज़ाहरा करें और इस ताल्लुक़ से पाए जाने वाले मनफ़ी रुजहान को तर्क किया जाए और उन्हें किसी तरह का ये अंदेशा नहीं होना चाहीए कि कोई भी फ़ैसला ग़लत होगा और फिर उन्हें उसकी सज़ा भुगतनी पड़ेगी।

हमारी तमाम तर कोशिश ये होनी चाहीए कि बेहतर से बेहतर काम की अंजाम दही को यक़ीनी बनाया जाय। करप्शन से मुक़ाबला के नाम पर हुकूमत किसी को निशाना नहीं बनाएगी। हमारी हुकूमत का ये अह्द है कि एक ऐसा निज़ाम तैयार किया जाए जो फ़ैसलाकुन हो और जहां सरकारी मुलाज़मीन की फ़ैसला साज़ी के मुआमला में हौसला अफ़्ज़ाई हो सके।

किसी को भी इत्तेफ़ाक़ी ग़लती पर हरासाँ ना किया जाए और बाअज़ फ़ैसले जो ग़लत साबित हो जाएं उन पर सख़्त कार्रवाई से गुरेज़ किया जाए। इसके साथ साथ वज़ीर-ए-आज़म मनमोहन सिंह ने सियोल सरवेंट्स के बारे में पाए जाने वाले आम नुक़्ता-ए-नज़र का भी हवाला दिया और कहा कि अख़लाक़ी इक़दार को फ़रोग़ दिया जाना चाहीए।

आम तौर पर चंद दहिय क़ब्ल सरकारी मुलाज़मीन के ताल्लुक़ से जो तास्सुर पाया जाता था वो काफ़ी हद तक ख़तम हो चुका है। उन्होंने कहा कि सरकारी मुलाज़मीन के फ़ैसले आज़ादाना नौईयत के होने चाहीए और साथ ही साथ उन्होंने ये भी वाज़िह किया कि हुकूमत दयानतदार सरकारी मुलाज़मीन के तहफ़्फ़ुज़ के लिए पाबंद अह्द है। बसा औक़ात ( कभी कभी) काम के दौरान जो उमूमी नौईयत की गलतीयां होती हैं उन्हें नजर अंदाज़ किया जा सकता है।

हमारे पास ऐसे ब्यूरोक्रेसी नहीं हो सकती जो सद फ़ीसद जोखिम से पाक हो। चुनांचे हमें सरकारी मुलाज़मीन के जुर्रत मंदाना फ़ैसलों की हौसला अफ़्ज़ाई करनी चाहीए। बशर्ते कि ये फ़ैसले क़ानून के दायरा कार में हो। एक ऐसा सरकारी मुलाज़िम जो किसी तरह का फ़ैसला ना करे ज़रूरी नहीं कि वो हमेशा महफ़ूज़ रहे और आख़िर-ए-कार नतीजा यही बरामद होगा कि इस ने हमारे समाज और मुल्क के लिए किसी तरह की कोई ख़िदमत अंजाम नहीं दी।

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