Thursday , September 20 2018

सरदार सरोवर पुनर्वास स्थल के लिए जिनकी जमीन अर्जित हुई उन्हें भी 2 हेक्टर्स जमीन का मिलेगा लाभ

बड़वानी: सरदार सरोवर पुनर्वास स्थलों के लिए जिन किसानों की भूमि 2003 के पूर्व में जबरन अर्जित की गयी थी ऐसे किसानों को उस वक्त की पुनर्वास नीति का डूब क्षेत्र के प्रभावितों के जैसे ही लाभ मिलेगा यह आदेश शिकायत निवारण प्राधिकरण ने दिया था। ग्राम छोटी कसरावद के मूलचंद पिता झापडिया को प्राप्त शिकायत निवारण प्राधिकरण के आदेश के खिलाफ नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण से उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की गई थी।

नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण का कहना था कि मूल पुनर्वास नीति में बदलाव लाया गया है इसलिए यह लाभ उन्हें नहीं मिल सकता। उच्च न्यायालय ने विस्थापितों की ओर से अधिवक्ता प्रत्युष मिश्रा एवम् न.घा.वि.प्रा. की ओर से अधिवक्ता विवेक पटवा की विस्तार से सुनवाई करने बाद W.P. No. 5594/2016 में 8/3/2018  को पारित आदेश द्वारा न.घा.वि.प्रा. की याचिका खारिज करते हुए पुनर्वास स्थल प्रभावित मूलचंद भाई को 2 हेक्टर जमीन, पुनर्वास नीति के अमल सहित देने का शि.नि.प्रा.का आदेश समर्थनीय व न्यायपूर्ण ठहराया है। इस आदेश से कई सारे भूमिहीन या बरबाद हुए किसानों- आदिवासी दलित व अन्य सभी को महत्वपूर्ण न्याय मिल पाना संभव हुआ है।

म.प्र.शासन ने सरदार सरोवर विस्थापितों के लिए पुनर्वास स्थल बनाने के लिए डूब क्षेत्र के विस्थापितों के अलावा अन्य किसानों की जमीन बडे पैमाने पर याने कुछ हजार हेक्टर्स अर्जित की। सरदार सरोवर आंतर राज्य परियोजना के लिए नर्मदा ट्रिब्यूनल फैसले के अलावा राज्य की नर्मदा योजनाओं के लिए पुनर्वास नीति भी कानूनी आधार मानी गयी है। यह भूमिका सर्वोच्च अदालत के नर्मदा बचाओ आंदोलन की याचिका में दिये गये 2000 के फैसले से स्पष्ट है।

पुनर्वास नीति में विस्थापित की परिभाषा 1989 से 2003 तक यह थी कि डूब से प्रभावितों के अलावा सरदार सरोवर/नर्मदा परियोजना के अन्य किसी कार्य से भी प्रभावित होने वाले (जिनकी संपत्ति अर्जित होती है) ऐसे परिवारों को भी परियोजना के विस्थापित माना जाएगा। फिर 2001 में इस परिभाषा में संशोधन के द्वारा डूब प्रभावितों के अलावा मात्र नहर व परियोजना की कॉलोनी के लिए भू-अर्जन होने पर विस्थापित के वर्ग में परिवार को सम्मिलित माना गया। फिर 21 अगस्त 2003 के संशोधन से नीति में विस्थापित की परिभाषा अधिक संकुचित करते हुए मात्र डूब प्रभावितों को ही  विस्थापित  के वर्ग में शामिल रखा गया।

लेकिन पुनर्वास नीति के अनुसार (कंडिका 4.3)  2003 के बाद भी यह प्रावधान रहा है कि पुनर्वास स्थल के लिए किसी आदिवासी दलित या छोटे व सीमान्त किसान की भूमि अर्जित नहीं की जाएगी। अन्य किसी भी किसान की भूमि अर्जित करने के पहले भी यह लिए 2 हेक्टर जमीन छोडकर बची हुई जमीन वही अर्जित होगी अन्यथा नहीं।

नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण ने इन तमाम कानूनी आधारों को दुर्लक्षित करते हुए आदिवासी, दलित व अन्य किसानों की भूमि भी नीति के उल्लंघन सहित अर्जित की। इससे कई किसान भूमिहीन हो गये और अन्य कई सीमान्त बन गये। वे सभी वंचित होकर न्याय की अपेक्षा करते रहे। संघर्ष भी जारी रहा।

इससे पीडित किसानों को शिकायत निवारण प्राधिकरण ने अलग अलग आदेश दिये किन्तु बहुतांश आदेशों में उनके परिवार को 2 हेक्टर जमीन की पात्रता दी गयी थी। फिर भी कई प्रभावित परिवारों को न.घा.वि.प्रा. ने ठुकराया और शि.नि.प्रा. के आदेशों का पालन नहीं किया। इनमें से मूलचंद पिता झापडिया को प्राप्त शि.नि.प्रा. के आदेेश के खिलाफ न.घा.वि.प्रा. ने म.प्र.उच्च न्यायालय (इंदौर) में याचिका दाखिल की जिस पर इसी महिने में पूरी बहस हुई। अधिवक्ता प्रत्युष मिश्रा ने विस्थापितों की ओर से पैरवी की। अधिवक्ता कैलाशचन्द्र यादव ने सहायता की।

न्या.पी.के.जायसवाल व न्या.वीरेन्द्रसिंग की खण्डपीठ ने यह फैसला देकर पुनर्वास स्थलों के याने परियोजना के ही लिए अपनी उपजाऊ कृषि भूमि देने वाले किसानों के योगदान की दखल लेकर न्याय दिलाने का कार्य किया है जिसका नर्मदा बचाओ आंदोलन स्वागत करता है।

नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण का यह फर्ज बनता है कि वह अपील याचिका में समय व पूंजी बरबाद न करते हुए पुनर्वास स्थल प्रभावित सभी किसानों को न्याय दे।

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