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सलाला ( बारकस ) के अवाम पानी खरीद कर पीने पर मजबूर

नुमाइंदा ख़ुसूसी पुराना शहर के कई एसे इलाक़े हैं जहां अधूरे पराजकटस देखने को मिल जाएंगे । इन ही में से एक पराजकट बारकस के सलाला इलाक़ा में है जो अधूरी पानी की टांकी की शक्ल में देखने को मिलेगा । इस टांकी का संग बुनियाद साल 2009 में सा

नुमाइंदा ख़ुसूसी पुराना शहर के कई एसे इलाक़े हैं जहां अधूरे पराजकटस देखने को मिल जाएंगे । इन ही में से एक पराजकट बारकस के सलाला इलाक़ा में है जो अधूरी पानी की टांकी की शक्ल में देखने को मिलेगा । इस टांकी का संग बुनियाद साल 2009 में साबिक़ चीफ मिनिस्टर ने किया था और इस मौक़ा पर मुक़ामी क़ाइदीन बड़े ही तमतराक़ के साथ वहां मौजूद थे जैसे वो अपनी जेब से इस काम को अंजाम दे रहे हैं । जुमला 22.37 करोड़ रुपय के मसारिफ़ से एक एकड़ अराज़ी पर 500ml गुंजाइश की टांकी तामीर करने का मंसूबा था और पराजकट की तकमील की मुद्दत 9 माह रखी गई थी लेकिन मुक़र्ररा मुद्दत में काम की तकमील तो दूर तक़रीबा 3 साल की मुद्दत गुज़र जाने के बाद भी ये काम पाया तकमील को नहीं पहुंच पाया ।

दौरान तामीर कई मर्तबा काम रोका गया और हर बार यही वजह बताई गई कि फ़ंड की कमी की वजह से मसला पैदा होरहा है । एसा महसूस होता है कि बलदिया चंदा कर के टांकी की तामीर का काम अंजाम दे रहा है । हैरत की बात तो ये है कि एक पानी की टांकी के लिए फ़ंडज़ की क़िल्लत बताई जा रही है जिस वक़्त ये पानी की टांकी का संग बुनियाद रखा गया था उस वक़्त सलाला इलाक़ा में जश्न का माहौल था लेकिन अवाम को ये नहीं मालूम था कि इन के मुहल्ला तक पानी पहुंचने से पहले उन के ख़ुशीयों पर पानी फिरने वाला है । संग बुनियाद के तख़्ती पर साबिक़ चीफ मिनिस्टर के नाम के साथ बड़ी शान से दीगर के नाम भी तहरीर करवाए गए हैं जैसे उन्हों ने तख़्ती लगा करअवाम पर बहुत बड़ा एहसान कर दिया हो ।

इस तख़्ती को देख कर गरीब अवाम को बुनियादी सहूलतें फ़राहम करने का वाअदा करने वालों की क़लई खुल जाती है । आज इस इलाक़ा में सूरत-ए-हाल ये है कि लोग पानी खरीद कर पीते हैं । मुहल्ला के अवाम का कहना है कि पानी की क़िल्लत से होरही तकलीफ देखने के लिए कोई दौरा नहीं करते लेकिन झूटे दिलासे देने ज़रूर पहुंच जाते हैं । सलाला के अवाम ये समझ चुके हैं कि इस पानी की टांकी का अगर इफ़्तिताह होगा भी तो वो इंतिख़ाबात सी ऐन क़बल होगा और इस वक़्त क़ाइदीन अवाम के दरमियान आएंगे और उन की अज़ियत रसानी को कारनामा के तौर पर पेश करेंगे ।

फ़िलहाल तो मुक़ामी अवाम अभी से ये सोच कर परेशान हैं कि मौसिम-ए-गर्मा के आग़ाज़ से पहले पानी की इतनी क़िल्लत है तो ऐन मौसिम-ए-गर्मा में क्या हाल होगा । कहीं इस पानी के टांकी का हाल भी ग़ौस नगर की पानी की टांकी जैसा ना होजाए जो सलाला से 2 केलो मीटर के फ़ासिला पर 5 साल क़बल तामीर तो करदी गई लेकिन आज तक इस का इफ़्तिताह अमल में नहीं लाया गया । इस इलाक़ा के लोग आज भी इस वहम में जी रहे हैं कि एक दिन पानी की टांकी में पानी आएगा । 33 करोड़ रुपय के मसारिफ़ से ये पानी की टांकी तामीर तो करदी गई लेकिन अवाम को आज भी पानी खरीद कर पीना पड़ रहा है । क़ारईन हमें डर है कि कहीं सलाला की पानी की टांकी का हश्र भी ग़ौस नगर की पानी की टांकी जैसा ना होजाए ।

एक ओहदेदार ने बताया कि सलाला में पानी की टांकी के लिए जो जगह की निशानदेही की गई है वो भी सहीह नहीं है । एक तो ये चटानी इलाक़ा पर तामीर की जा रही है और दूसरे इस का रास्ता भी इस क़दर ऊबड़ खाबड़ है कि मेटरेल वहां तक ले जाना आसान नहीं है । ओहदेदार ने बताया कि टांकी की तामीर को मज़ीद 3 माह का वक़्त लग सकता है । अगर ओहदेदार की बात को मान लिया जाय तो फिर सलाला के अवाम को हर साल की तरह इस मौसिम-ए-गर्मा में भी आबी क़िल्लत झेलनी है । क़ारईन ! जब हम ने इस टांकी का ख़ुद मुआइना किया तो देखा कि अभी तो इस की छत का काम भी मुकम्मल नहीं हो पाया है । आधी छत डाली गई है जब कि बक़ीया छत का काम क़िस्तों में होरहा है । मुक़ामी अवाम भी ख़ूब हैं ।

बलदिया की जानिब से उन के इलाक़ा में तामीर की जा रही पानी की टांकी के तअल्लुक़ से ओहदेदारों से सवाल करना तक ज़रूरी नहीं समझ रहे हैं जब कि अवाम को मालूम होना चाहीए कि ये इंही का पैसा है जिस से पानी की टांकी तामीर की जा रही है । मकान का टैक्स , मकान की खरीदी के वक़्त नोट्री यह रजिस्ट्रेशन करवाने यह फिर मकान की तामीर के लिए बलदिया से इजाज़त लेते वक़्त जो सरकारी फीस अदा की जाती है इसी पैसे से इलाक़ा में बलदिया की जानिब से बुनियादी सहूलतों की फ़राहमी के काम अंजाम दीए जाते हैं । अवाम अपनी मेहनत का पैसा दे कर भी ख़ामोशी से तकलीफ बर्दाश्त कररहे हैं तो ये उन की लाशऊरी का नतीजा है । इस में दूसरों से गला शिकवा कैसा ।

अवाम में शऊर बेदार होने तक तो मुश्किलात , मसाइल और मसाइब इन का मुक़द्दर बने रहेंगे । अवाम को चाहीए कि वो बलदी सहूलतों की अदम फ़राहमी पर मुतअल्लिक़ा बलदी ओहदेदार से रुजू हूँ और अपनी शिकायत दर्ज करवाएं । अगर मसला बड़ा हो तो मुहल्ला के चंद लोग इकट्ठा हो कर मसला को आला बलदी हुक्काम के इलम में लाएं । हाथ पर हाथ धरे बैठने से अवामको और उन की आने वाली नसल को भी इसी तरह मसाइब झेलते रहने की आदत पड़ जाएगी ।

अवाम को बुनियादी सहूलतों की फ़राहमी केलिए ओहदेदारों को मोटी मोटी तनख़्वाहें दे कर मुक़र्रर किया गया है लेकिन कोई उन से रुजू ही नहीं होगा तो भला उन्हें अवाम की तकलीफ का पता कैसे चलेगा । बहरहाल हुकूमत से मुतालिबा है कि वो सलाला इलाक़ा में पानी की टांकी का काम तेज़ी के साथ मुकम्मल करवाए और इस बात को यक़ीनी बनाए के मुक़ामी अवाम को पानी खरीद कर पीने की मुश्किलात झेलनी ना पड़े ।।

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