Wednesday , December 13 2017

सामुहीक कल्याण‌ के लिए धर्म‌ और सियासत में इश्तिराक अवशयक‌

उजड़ कर आने वाले मुहाजिरीन की बेहतर आबादकारी और बहाली के लिए रसूल अल्लाह सव.

उजड़ कर आने वाले मुहाजिरीन की बेहतर आबादकारी और बहाली के लिए रसूल अल्लाह सव. ने ख़ुशहाल अंसार (मदनी मुसल्मान) और मुहाजिरीन के दरमयान रिश्ता मूवाख़ात‌ या भाई चारा क़ायम कर दिया। मुवाख़ात के रिश्ते में मुंसलिक हर दो ख़ानदान मिल जुल कर रोज़ी कमाते और कारोबार ज़िंदगी में एक दूसरे के साथ मदद करते।

आप स.व. के ख़्याल में इंसानों की इज्तेमाई फ़लाह-ओ-बहबूद(कल्याण) के लिए ज़रूरी है कि मज्हब और सियासत में इश्तिराक हो जाए। इस मक़सद के लिए आप स.व. ने मदीना के मुसल्मान और ग़ैर मुस्लिम नुमाइंदों का एक इज्लास मुनाक़िद किया, जिस में मुक़ामी अरब, यहूदी, मसीही और दीगर तमाम शामिल थे। आप स.व. ने तज्वीज़ पेश की कि मदीना में एक बाक़ायदा रियासत की दाग़ बैल डाली जाए। शुरका की रजामंदी के बाद आप स.व. ने इस नई मुजव्वज़ा रियासत का तहरीरी आईन तैयार कराया, जो तारीख़ आलम में अपनी नौईयत की पहली एसी दस्तावेज़ है, जिस में शहरीयों और सरबराह रियासत के हुक़ूक़ और फ़राइज़ का वाज़िह तौर पर तायुन कर दिया गया था।

रसूल अल्लाह स.व. को मुत्तफ़िक़ा तौर पर इस रियासत का सरबराह क़रार दिया गया, जिस के बाद अपने तौर पर इंसाफ़ हासिल करने का पुराना रिवाज ख़त्म‌ कर दिया गया और इंसाफ़ की फ़राहमी उम्मा के शहरीयों की मर्कज़ी तंज़ीम या हुकूमत की ज़िम्मेदारी क़रार पाई। आईन की इस दस्तावेज़ में दीफ़ाइ और ख़ारिजा पालिसी के उसूल भी वज़ा किए गए। इस में समाजी तहफ़्फ़ुज़ के निज़ाम की तशकील भी की गई, जिस को मआकिल का नाम दिया गया। इस में ये तय‌ किया गया कि इख़तेलाफ़ात की सूरत में रसूल अल्लाह स.व. का फ़ैसला हर्फ़ आख़िर होगा और आप स.व. को क़ानूनसाज़ी के भी लामहदूद इख़्तेयारात हासिल होंगे, इस में ख़ुसूसन अहल यहूद के लिए मज़हबी आज़ादी की ज़मानत दी गई और उन्हें ज़िंदगी के तमाम शोबों में मुसल्मानों के बराबर शहरी हुक़ूक़ का हक़दार क़रार दिया गया।

रसूल अल्लाह स.व. अक्सर-ओ-बेशतर मदीना के मुज़ाफ़ात(करीब के गाँव) में आबाद क़बाइल और बस्तीयों में जाते, ताकि उन से अह्द वफ़ादारी हासिल करने और एक दूसरे की मदद पर मबनी मुआहिदा की कोशिश करें। आप स.व. ने इन क़बाइल की मदद से मुशरिकीन मक्का पर मआशी दबाउ डालने का फ़ैसला किया, जिन्हों ने हिज्रत करने वाले मुसल्मानों की अम्लाक पर क़ब्ज़ा कर लिया था और इस के इलावा भी मुस्लमानों को काफ़ी ज़्यादा नुक़्सान पहुंचाया था। इस फ़ैसला के तहत मक्का के तिजारती क़ाफ़िलों के रास्तों पर आबाद मदनी क़बाइल की मदद से मुतअद्दिद क़ाफ़िले मुसल्मानों ने लूट लिए, या उन्हें रास्ता बदलने पर मजबूर कर दिया, जिस से क़ुरैश मक्का में शदीद इश्तिआल फैल गया और एक खूँरेज़ जंग नागुज़ीर नज़र आने लगी।

अपनी क़ौम के माद्दी मुफ़ादात की फ़िक्र में रुहानी पहलू कभी आप स.व. से नजरअंदाज़ ना होने पाए। हिज्रत मदीना को बमुश्किल एक साल गुज़रा था, जब रुहानी नज़म का सख़्त तरीन जुज़ यानी माह रमज़ान उल-मुबारक के रोज़े हर मुस्लमान मर्द और औरत पर फ़र्ज़ कर दिए गए।
अपने हमवतन मुसल्मानों को निकाल कर भी कुफ़्फ़ार मक्का को सब्र ना आया और उन्हों ने अहल मदीना को धमकी दी कि मुहम्मद (स.व.) और उन के साथीयों को हमारे हवाले किया जाए या कम अज़ कम उन्हें मदीना से निकाल दिया जाए। लेकिन ये तमाम गीदड़ भबकियां बेसूद साबित हुईं। इस के चंद माह बाद सन २ हिज्री में कुफ़्फ़ार मक्का एक बड़ा लश्कर लेकर आप स.व. पर चढ़ दौड़े, जिन्हें आप स.व. ने आगे बढ़ कर बदर के मुक़ाम पर रोक लिया। काफ़िरों की तादाद मुसल्मानों से तीन गुना ज़्यादा थी, मगर उन्हें शिकस्त फ़ाश का मुंह देखना पड़ा।

एक साल की भरपूर तैयारीयों के बाद कुफ़्फ़ार मक्का एक बार फिर मदीना पर हमला आवर हुए, ताकि बदर की शिकस्त का बदला ले सकें। इस मर्तबा उन की फ़ौज की तादाद मुस्लमानों से चार गुना ज़्यादा थी। अह्द के मुक़ाम पर एक खूँरेज़ लड़ाई के बाद दुश्मन पीछे हट गया और ये मुहिम बड़ी हद तक बेनतीजा रही। मक्की फ़ौज में शामिल किराये के जंगजू अपनी ज़िंदगी को मज़ीद ख़तरे में डालने के लिए तैयार ना थे।

{इसी बीच‌ में मदीना के यहूदीयों ने फ़ित्ना अंगेज़ी शुरू करदी। बदर की फ़तह के मौक़ा पर यहूदी सरदार काब बिन अशरफ़ काफ़िरों से इज़हार‍ ए‍ यकजिहती के लिए मक्का गया और इस ने अहल ए मक्का के दिलों में इंतिक़ाम की आग भड्काने की पूरी कोशिश की। जंग अह्द के बाद इस के क़बीला ने आप स.व. की जान लेने की साज़िश की और मंसूबा बनाया कि आप स.व. को अपनी आबादी में बुलवाकर किसी ऊंची जगह से चक्की का पाट आप स.व.पर गिरा दिया जाए। इन साज़िशों के जवाब में आप स.व. ने मदनी यहूदीयों से सिर्फ ये मुतालिबा किया कि वो इलाक़ा छोड्कर चले जाएं और उन्हें अपना माल साथ ले जाने, अपनी ग़ैर मंक़ूला अम्लाक फ़रोख्त करने और मुसल्मानों से अपने कर्जे़ वसूल करने की भी इजाज़त दे दी। आप स.व. की इन मेहरबानीयों का उल्टा असर हुआ। मदीना से निकाले गए यहूदीयों ने ना सिर्फ कुफ़्फ़ार मक्का, बल्कि मदीना के शुमाल-ओ-जुनूब और मशरिक़ में आबाद क़बाइल से राबिता पैदा किया, उन्हें जंगी मदद कि और ख़ैबर से मदीना पर हमला करने का मंसूबा बनाया और उह्द से चार गुना बड़ी फ़ौज इकट्ठा करदी। मुसल्मान मदीना के गर्द ख़ंदक़ खोदकर शहर के दिफ़ा पर कमरबस्ता हो गए। ये अब तक की आज्माईशों में सब से बड़ी थी। अगरचे मदीना में बाक़ी रह जाने वाले यहूदीयों की मुसल्मानों की पीठ में छुरा घोंपने की साज़िश नाकाम हो गई, ताहम अपनी फ़िरासत पर मब्नी हिक्मत-ए-अमली से रसूल अल्लाह स.व. दुश्मनों की सफ़ों में फूट डल्वाने में कामयाब हो गए और काफ़िरों के तमाम हलीफ़ एक एक करके उन से अलाहिदा होकर वापिस चले गए। इन ही अय्याम में मुसल्मानों के लिए शराबनोशी, जूवाह बाज़ी और पाँसा फेंक कर क़िस्मत मालूम करने जैसे कामों की मुमानअत करदी(रोक लगा दी) गई।

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