Friday , December 15 2017

सालिह मुआशरा की तामीर में हिस्सा लेने की तलक़ीन

* गुलबर्गा में जमात-ए-इस्लामी का ख़िताब आम, मुहतरमा सालहा तबस्सुम-ओ-दीगर का ख़िताब

* गुलबर्गा में जमात-ए-इस्लामी का ख़िताब आम, मुहतरमा सालहा तबस्सुम-ओ-दीगर का ख़िताब
गुलबर्गा / जिस तरह एक बुरी बीवी शौहर‍ ओर‌-ख़ानदान की ज़िंदगी दो भर कर देती है इसी तरह एक नेक बीवी नेकियों में अपने शौहर को मदद‌ के ज़रीये उस को बुलंदीयों तक ले जा सकती है।

इन ख़्यालात का इज़हार जमात-ए-इस्लामी हिंद गुलबर्गा शोबा ख़वातीन की तरफ‌ से शालीमार गार्डन फंक्शन हाल ख़्वाजा कॉलोनी में शनिवार‌ सालिह मुआशरा की तामीर और मुस्लमान ख़वातीन के उनवान पर मनाई जा रही मुहिम के दूसरे ख़िताब आम की सदारत करते हुए शोबा ख़वातीन की नाज़िमा सालहा तबस्सुम ने किया।

उन्हों ने कहाकि ख़वातीन को इस बात को ठान लेना चाहीए कि उन्हें सालिह मुआशरा बना कर रहना है। अब तक सुनना और सुनाना बहुत होचुका अब कुछ करके दिखाना है।

“नइ नसल‌ का बिगाड़ और ख़वातीन का रोल” उनवान पर तक़रीर करते हुए डाक्टर नासिहा तबस्सुम , लेक्चरर, टीपू सुलतान यूनानी मैडीकल कॉलिज गुलबर्गा ने कहा कि मिलेजुले तालीमी निज़ाम की वजह से मुआशरा में बिगाड़ पैदा होचुका है। जब कि एक जायज़ा बताता है के जो लड़के‍ ओर‌-लड़कीयां जुदागाना निज़ाम में तालीम हासिल करते हैं उन की तालीमी कारकर्दगी बेहतर हो रही है। इस लिए बर्तानिया जैसे मग़रिबी मुल्क में जुदागाना तालीम की सिफ़ारिश की जा रही है।

आज मुआशरा में हर कोई अपनि ज़िंदगी के मेयार को बढ़ाने की फ़िक्र कर रहा है। कोई औरत‌ नौकरी करती है या सूद पर लेन देन करती है तो इस की असल वजह ज़िंदगी का मेयार है ना कि बुनियादी जरूरतों को पुरा करना। उन्हों ने कहा कि औरत को अल्लाह ताला की तरफ‌ से दिए गए अपनी हक़ीक़ी पोज़िशन को समझने की ज़रूरत है। इस का अमली मैदान हक़ीक़त में घर है ना कि ओफिसें या कारोबारी संस्थाएं।

“इस्लामी ख़ानदान और मौजूदा मुस्लिम मुआशरा” उनवान पर तक़रीर करते हुए तसनीम फ़ातिमा , नाज़िमा हलक़ा सीरत कॉलोनी, जमात-ए-इस्लामी हिंद गुलबर्गा ने कहा कि आज औरत अपने हुक़ूक़ हासिल करने की कोशिश कर रही है जबकि फ़राइज़ की अदायगी में कोताही दिखा रही है। अगर मुस्लमान औरत हुक़ूक़ से ज़्यादा फ़राइज़ को अदा करनेवाली बनती है तो वो हज़रत ख़दीजा की तरह मिसाली माँ-ओ-बेटी बन सकती है और हज़रत फ़ातेमा जैसी मिसाली बेटी बन सकती है और इस दूध वाली की बेटी जैसी बन सकती जिस को अल्लाह का ख़ौफ़ दूध में पानी मिलाने से रोकता है।

प्रोग्राम कि शुरूआत‌ अस्मा नुज़हत,नाज़िमा हलक़ा रहमत नगर, जमात-ए-इस्लामी हिंद गुलबर्गा के दरस क़ुरान से हुआ। अनीस फ़ातिमा , रुकन जमात-ए-इस्लामी हिंद , गुलबर्गा इफ़्तिताही कलिमात पेश किए।

TOPPOPULARRECENT