सुपुर्द-ए-खाक हुए ‘मिनी ताजमहल’ बनवाने वाले फैजुल हसन कादरी, उमड़ा जनसैलाब!

सुपुर्द-ए-खाक हुए ‘मिनी ताजमहल’ बनवाने वाले फैजुल हसन कादरी, उमड़ा जनसैलाब!
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‘मिनी ताजमहल’ बनवाने वाले फैजुल हसन कादरी  को शनिवार सुबह 10: 45 बजे हजारों लोगों की मौजूदगी में मरहुम बेगम की कब्र के बराबर में सुपुर्द ए खाक किया गया। इस  मौके पर पहुंचकर एसडीएम, सीओ, कोतवाली निरीक्षक ने भी पुष्पांजलि अर्पित की। उनके जाने के साथ ही उनकी कई यादें यहीं छूट गईं जिसकी वजह से लोग हमेशा उन्हें याद करेंगे।

डिबाई क्षेत्र के गांव पला केसर निवासी फैजुल हसन कादरी अपने पीछे कई यादें छोड़ गए हैं। उन द्वारा बेगम की याद में बनाया गया मिनी ताजमहल, उनकी दान की गई जमीन पर बना तीन मंजिला कन्या इंटर कॉलेज और उनके द्वारा लिखी गई 425 गजल उन्हें हमेशा याद कराती रहेंगी। पला केसर निवासी फैजुल हसन कादरी डाक विभाग में पोस्टमैन के पद पर तैनात रहे। उनकी बेगम तज्जुमुली बेगम थी और उनके कोई संतान नहीं थी। पोस्टमैन के पद पर रहते हुए इमानदारी से काम किया, जिसकी आज भी चर्चा की जाती है। बताया जाता है कि वह अपनी बेगम से बहुत प्यार करते थे।

कादरी ने बेगम के इंतकाल के बाद 24 दिसंबर 2011 में बेगम की याद में मिनी ताजमहल का निर्माण शुरू करवाया तो वह सुर्खियों में आए। उनके ताजमहल को देखने के लिए देश से ही नहीं, विदेशों से भी आने वाले विदेशी पर्यटक भी समय-समय पर आते रहे। इस मिनी ताजमहल पर ‘द रियल थिंग’ नाम की एक डाक्यूमेंट्री भी बनाई गई, जो विश्व भर में अपनी पहचान बनाने के साथ कादरी के नाम को और सुर्खियों में ला खड़ा किया। कादरी ने अपनी बेगम की याद में 425 गजलें भी लिखी। इन गजलों को हर वर्ग के लोग पसंद करते हैं। उनके पास जो जमीन थी, उसमें से कुछ हिस्से में मिनी ताजमहल बनवा दिया और बाद में उसे वक्फ बोर्ड के हवाले कर दिया।

इसके साथ ही उन्होंने एक और अच्छी पहल करते हुए अपनी पहचान को और बढ़ा दिया। उन्होंने बची हुई जमीन पर कन्या इंटर कॉलेज बनवाने का निर्णय लिया। इस दौरान जिले में तत्कालीन डीएम बी चंद्रकला ने उनके इस निर्णय को सराहा नहीं, बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात करवाकर राजकीय कन्या इंटर कॉलेज का निर्माण करवाने में अहम योगदान दिया। यह इंटर कॉलेज बनकर तैयार हो गया है और सरकार की ओर से इसे चलाने के लिए तैयारी चल रही है। कादरी का अब सड़क दुर्घटना में इंतकाल हो गया, लेकिन वह अपने पीछे कई यादें छोड़ गए हैं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता। जब भी उनका नाम आएगा तो उनके द्वारा किए गए कार्यों को ही नहीं, बल्कि उनकी याद ताजा हो उठेंगी।

फैजुल हसन का सड़क हादसे में इंतकाल हो गया। इसके साथ ही उनका आखिरी सपना भी अधूरा रह गया। उनका सपना था कि उनके द्वारा दान में दी गई जमीन पर जो राजकीय कन्या इंटर कॉलेज बना है। उसका नाम उनकी बेगम तज्जुमुली के नाम पर हो। इसके लिए वह पिछले काफी समय से प्रयासरत थे और कई बार अपनी मांग को जिला प्रशासन से लेकर प्रदेश सरकार तक उठा चुके, लेकिन उनका सपना पूरा नहीं हो सका।

फैजुल ने विश्व में चमकाया बुलंदशहर का नाम 
फैजुल हसन ने बेगम की याद में मिनी ताजमहल बनवाकर बुलंदशहर को विश्व में चमकाने का काम किया। हालांकि जिले में कुछ ऐसे स्थान हैं, जहां पर देश के कोने-कोने से लेकर विदेशी भी आते रहते हैं। यदि वह अपनी बेगम की याद में मिनी ताजमहल नहीं बनवाते तो शायद ही विदेशी पर्यटक और बनाई गई डाक्यूमेंट्री के बाद बुलंदशहर का नाम विदेशों में चंद लोग ही जानते।

जिस समय वर्ष 2015 में फैजुल हसन कादरी ने मिनी ताजमहल के साथ जमीन दान देकर कन्या इंटर कॉलेज बनवाने का बीड़ा उठाया तो इस कार्य में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और तत्कालीन डीएम बी चंद्रकला का विशेष योगदान रहा। इस बारे में बी चंद्रकला ने पूर्व सीएम अखिलेश यादव तक कादरी की मांग को पहुंचाने का काम किया था। अखिलेश यादव ने कादरी को लखनऊ आने का न्यौता दिया था और कन्या इंटर कॉलेज के निर्माण के लिए मंजूरी दे दी थी। कॉलेज निर्माण की मंजूरी मिलते ही कादरी फूले नहीं समा रहे थे। साथ ही तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उनके गांव को जनेश्वर मिश्र योजना में भी शामिल कराया था

बेगम की कब्र के पास आज हुए सुपुर्द-ए-खाक
फैजुल हसन कादरी का शव शनिवार की सुबह उनकी बेगम की कब्र के पास सुपुर्द-ए-खाक किया गया। फैजुल ने मिनी ताजमहल में अपनी बेगम की कब्र के पास ही अपनी कब्र के लिए जमीन पहले ही छोड़ दी थी। कादरी के निधन का समाचार मिलते ही क्षेत्र ही नहीं, अपितु जिले के अलावा जगह-जगह से उनके सगे-संबंधी, रिश्तेदार और प्रशंसक आदि का आना-जाना शुरू हो गया। उनका शव देखकर सभी की आंख नम थी और उनके द्वारा किए गए कार्यों की सराहना के साथ इमानदारी की चर्चाएं चल रहीं थी। सभी का कहना है कि उन्हें कभी भूलाया नहीं जा सकता। अब सभी को उनके सुपुर्द-ए-खाक होने के समय का इंतजार था। उनकी अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में भीड़ थी।

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