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सुषमा स्वराज के पाकिस्तान में जाने का मतलब :डॉ. बेद प्रताप वैदिक‌

सुषमा के पाक में होने का अर्थ
 
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
 
क्या महिने भर पहले कोई सोच सकता था कि हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आज पाकिस्तान में होंगी और वे प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ और विदेश मंत्री सरताज़ अजीज़ से बात कर रही होंगी? सुषमा दो बातों पर अड़ी हुई थीं। एक तो अगर दोनों देशों के बीच कोई बात होगी तो उनमें ही होंगी। किसी तीसरे देश में नहीं होगी। लेकिन हुआ क्या? पहले रुस के ऊफा में बात की, दोनों प्रधानमंत्रियों ने, उसके पहले 2014 में दोनों काठमांडों में गुपचुप मिले और फिर पेरिस में मिले। पेरिस ने ही बैंकाक की राह खोली और बैंकाक ने इस्लामाबाद के दरवाजे खोले। याने इसका सबक यह हुआ कि विदेश नीति के मामले में आप बज्रासन लगाकर बैठ जाएं तो आप बैठे ही रह जाएंगे। आपको तरह−तरह के पैंतरे अख्तियार करने पड़ते हैं।
 
दूसरी बात जिस पर मोदी सरकार और सुषमाजी अड़ी हुई थीं, वह यह कि आतंकवाद और बातचीत साथ−साथ नहीं चल सकते। पाकिस्तान पहले आतंकवाद बंद करे, तब उससे बात हो। यह बात भाजपा के पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिंहा अभी भी कह रहे हैं। वे सुषमा की पाकिस्तान−यात्रा की आलोचना कांग्रेस से भी ज्यादा तीखी कर रहे हैं। कांग्रेस के नेताओं ने खुद को मसखरा बना लिया है। वे कह रहे हैं कि सुषमा और मोदी संसद को यह क्यों नहीं बता रहे कि वे पाकिस्तान से क्यों और क्या बात कर रहे हैं? जो कांग्रेस की सरकार मुंबई हमले के बावजूद पाकिस्तान से बातचीत का सिलासिला चलाए हुई थी, उसका इस वक्त लाल−पीला होना अजीब−सा लगता है। यदि भाजपा−जैसी पार्टी के नेता पाकिस्तान से बात चलाने के लिए मजबूर हो रहे हैं तो उसके पीछे कुछ न कुछ गणित तो जरुर होना चाहिए।
 
मुझे तो यह लगता है कि भारत और पाकिस्तान, दोनों के नेताओं को, अमेरिका और ब्रिटेन ने काफी दबाया है। ये दोनों महाशक्तियां पश्चिम एशिया के ‘इस्लामी राज्य’ के आतंक से लड़ने के लिए कटिबद्ध हैं। यदि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बना रहता है तो उस आतंक−विरोधी विश्वव्यापी लड़ाई का पक्ष कमजोर होता है। यह संयोग कितना अच्छा रहा कि पाकिस्तान के सेनापति जनरल राहिल शरीफ स्वयं वाशिंगटन गए और उन्होंने अमेरिकी अधिकारियों से सीधे बातचीत की। यह तथ्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि पाकिस्तान के नए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नसीरखान जेंजुआ फौज के सेवा−निवृत्त जनरल है। भारत के अजित दोभाल गुप्तचर सेवा के वरिष्ठ अफसर रहे हैं। दोनों सुरक्षा सलाहकारों से कोई बात छिपी नहीं है। सरताज़ अजीज अब विदेश नीति सलाहकार याने विदेश मंत्री ही हैं। यह टीम इतनी परिपक्व है कि यदि इसके बीच बातचीत चलती रहे तो कोई आश्चर्य नहीं कि द्विपक्षीय संबंध काफी उंचे मुकाम पर पहुंच जाएंगे। जेंजुआ जो भी बातचीत करेंगे, उसमें जितनी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की साझेदारी होगी, उससे ज्यादा फौज की होगी। सच्ची बात तो यह है कि भारत के बारे में पाकिस्तान की नीति तय करने में फौज की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। दूसरे शब्दों में मियां नवाज अब जो भी भारत−नीति बनाएंगे, उसे फौज का पूरा समर्थन मिलने की उम्मीद है।
 
जहां तक मोदी सरकार का प्रश्न है, उसने काफी लचीलेपन का परिचय दिया है। पाकिस्तान से वार्ता−भंग पहले उसी ने की थी। हुर्रियत के नेताओं से पाक−उच्चायुक्त क्यों मिल लिया? यह आपत्ति बिल्कुल बचकाना थी लेकिन क्या करें, यह सरकार नौसिखियों से भरी थी। उसे पता ही नहीं कि नरसिंहरावजी, अटलजी और डॉ. मनमोहनसिंह का हुर्रियतवालों से संपर्क बना रहता था। पीडीपी के साथ मिलकर कश्मीर में सरकार चलानेवाली पार्टी की यह मुद्रा बेमानी थी लेकिन मोदी सरकार के लचीलेपन की मैं दाद दूंगा कि उसने रुस के ऊफा में आगे होकर नवाज़ से बात की। अब बैंकाक−भेंट से गतिरोध तोड़नेवाली सरकार से विदेश नीति ही नहीं, घरेलू मामलों में भी काफी उम्मीद बांधी जा सकती है। यों तो सरकार को ज्यादा करके नौकरशाह ही चलाते हैं और विदेश तथा रक्षा−मंत्रालय को तो और भी ज्यादा, लेकिन नेताओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे नीति−निर्माण में भी हिस्सा बटाएं। अपना सारा समय नोट और वोट में ही न खपा दें। इसके अलावा नेतृत्व का अर्थ सिर्फ नौटंकी नहीं होता।
 
सुषमाजी पाकिस्तान पहुंची हैं, अफगानिस्तान के बहाने। इस समय वहां ‘एशिया का हृदय’ नामक सम्मेलन हो रहा है, जिसमें लगभग 30 महत्वपूर्ण देश भाग ले रहे हैं। ये राष्ट्र अफगानिस्तान के पुनर्निमाण पर बात करेंगे। पिछले 40 सालों में अफगानिस्तान की अस्थिरता ने ही विश्व−आतंकवाद को जन्म दिया है। पाकिस्तान और भारत को सबसे अधिक नुकसान हुआ है। भारत ने अभी तक 12 हजार करोड़ रु. से ज्यादा अफगानिस्तान में लगा दिए हैं। अफगानिस्तान को बनाने में यदि सुषमाजी भारत−पाक सहयोग का कोई ढांचा खड़ा कर सकें तो पूरे दक्षिण एशिया की ही दशा सुधर जाएगी।

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