सैक्यूलर हिंदूस्तान में इस्लाम दुश्मनी

सैक्यूलर हिंदूस्तान में इस्लाम दुश्मनी
हिंदूस्तान में सैक्यूलर ज़हन के क़ाइदीन और अवाम ने मलिक के दस्तूरी-ओ-जमहूरी रिवायत को मल्हूज़ रख कर ही आम इंसानों के लिए अमन-ओ-अमान का माहौल पैदा किया है। हिंदूस्तान में किसी मज़हब की दिल आज़ारी की कोई गुंजाइश नहीं है।

हिंदूस्तान में सैक्यूलर ज़हन के क़ाइदीन और अवाम ने मलिक के दस्तूरी-ओ-जमहूरी रिवायत को मल्हूज़ रख कर ही आम इंसानों के लिए अमन-ओ-अमान का माहौल पैदा किया है। हिंदूस्तान में किसी मज़हब की दिल आज़ारी की कोई गुंजाइश नहीं है।

अक्सरीयत एक पुरअमन बकाए बाहम की हामी है। चंद शरपसंद अनासिर ही मुल़्क की सैकूलर फ़िज़ा-ए-को मुकद्दर बनाना चाहते हैं बल्कि वो हर वक़्त अपनी नापाक साज़िशों में सरगर्म होने के बावजूद नाकाम होते हैं।

राजस्थान में जहां हुक्मराँ पार्टी कांग्रेस को सैक्यूलर अज़म पर चलने का इमतियाज़ी मौक़िफ़ हासिल था लेकिन बाद के दिनों में वो भी चंद शरपसंद अनासिर की फ़िर्कापरस्ती और नापाक ज़हनीयत का हिस्सा बन कर रह गई। जुए पुर फेस्टीवल में मुस्लमानों की दिल आज़ारी की जा रही है।

मलऊन मुसन्निफ़ सलमान रुशदी को दावत दी गई थी कि वो इस फेस्टीवल में शिरकत करके अपने नापाक और गुस्ताखाना ख़्यालात का इज़हार करे मगर हिंदूस्तान के मुस्लमानों और सैक्यूलर अवाम ने सलमान रुशदी के दौरा के ख़िलाफ़ शदीद एहतिजाज किया तो ये मलऊन मुसन्निफ़ अपनी जान को लाहक़ ख़तरा और बाअज़ इनंटेलीजेंस रिपोर्ट पर कि मुंबई के अंडरवर्ल्ड डॉन के शार्प शूटर्स की जानिब से उसे हलाक करने की साज़िश की गई है तो इस ने अपना इरादा मंसूख़ किया जबकि इस तरह के ख़तरा की कोई इतेला नहीं दी गई।

मगर जयपुर फ़ैस्टीवल के मुंतज़मीन ने मुस्लमानों की दिल आज़ारी का कोई मौक़ा ज़ाए होने नहीं दिया। मलऊन मुसन्निफ़ सलमान रुशदी की ममनूआ किताब शैतानी कलिमात के चंद इक़तिबासात पढ़ कर सुनाते हुए मुस्लमानों की दिल आज़ारी की है। ये वाक़िया भी सलमान रुशदी के दौरा हिंद से ज़्यादा एहमीयत रखता है कि एक सैक्यूलर मुल्क और हुक्मराँ पार्टी कांग्रेस के सैक्यूलर इमेज के बावजूद इस्लाम दुश्मन ताक़तों ने जयपुर फ़ैस्टीवल में मुस्लमानों के मज़हबी जज़बात को ठेस पहूँचाने में कोई कसर बाक़ी नहीं रखी।

अगर ये फेस्टीवल मंसूख़ कर दिया जाता तो दिल आज़ारी की जुर्रत नहीं होती। अब हुकूमत को ये इत्तिला दी गई है कि फेस्टीवल के ज़िम्मेदारों ने शैतानी कलिमात के इक़तिबासात पढ़ कर सुनाए हैं तो वो उन के ख़िलाफ़ कार्रवाई करे।

मुल्क के मुस्लमानों के जज़बात को ठेस पहूँचाने वाले वाक़ियात को रोकने से इस मुल्क का अमन-ओ-अमान बरक़रार रखने के इलावा एक तबक़ा के ख़िलाफ़ मज़मूम कोशिशों को नाकाम बनाना ज़रूरी है। हिंदूस्तान में मलऊन मुसन्निफ़ सलमान रुशदी की किताब पर पाबंदी है। दुनिया का पहला मुल्क हिंदूस्तान ही है जिस ने सब से पहले इस के गुस्ताहाना कलिमात वाली किताब पर पाबंदी आइद की थी।

ममनूआ किताब के बाअज़ इक़तिबासात को फेस्टीवल में पढ़ कर सुनाया जाना तो हुकूमत के अहकाम और यहां के क़ानून की ख़िलाफ़वर्ज़ी है। इस पर हुक्काम को फ़ौरी हरकत में आना चाहीए। जैसा कि फ़ैस्टीवल के मुंतज़मीन में से बाअज़ का कहना है कि मलऊन मुसन्निफ़ की किताब के इक़तिबासात का पढ़ना उन के प्रोग्राम में शामिल नहीं था। ये बाअज़ अफ़राद की ज़ाती कारस्तानी है।

ऐसे अफ़राद की गंदा ज़हनी या तास्सुब पसंदी को कुचलने के लिए पुलिस और हुकूमत को फ़ौरी कार्रवाई करनी चाहीए ताकि मुस्तक़बिल में फेस्टीवल या दीगर उनवानात से मुनाक़िद होने वाले प्रोग्रामों के ज़रीया मुस्लमानों की दिल आज़ारी के वाक़ियात का इआदा ना हो सके और ना ही इस्लाम दुश्मन ताक़तों को ये हौसला मिल सके कि वो अपनी मनमानी के ज़रीया हिंदूस्तान की सैकूलर फ़िज़ा-ए-को मुकद्दर कर सकें।

सलमान रुशदी हिंदूस्तान नहीं आया लेकिन इस के नुमाइंदों ने किताब के गंदे और नापाक जुमलों को पढ़ कर सुनाया। सलमान रुशदी यहां ना होकर भी अपने शैतानी कलिमात को फैलाने की कोशिश की है। इस तरह की हरकतों का सख़्त नोट कर लिया जाय। सलमान रुशदी ने अपने हामीयों की इस हरकत पर ख़ुशी का इज़हार किया है।

रुशदी ने ट्वीटर पर इन मुसन्निफ़ीन का शुक्रिया अदा किया जिन्हों ने इस की गंदी किताब के नापाक और गुस्ताखाना जुमलों को पढ़ कर सुनाया। उन्हें बार बार दुहराया। इस किताब पर 1988 में हिंदूस्तान में पाबंदी आइद कर दी गई है। इस के बाद किताब के हवाले से बार बार मुल्क में तशहीरी प्रोग्राम कराना ख़िलाफ़-ए-क़ानून है।

इस लिए हुकूमत और पुलिस को चाहीए कि वो क़ानून की रो से फ़ैस्टीवल के ज़िम्मेदारों और शैतानी कलिमात के बाअज़ हिस्सों को पढ़ कर सुनाने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करे। हिंदूस्तान में इस्लाम दुश्मनी को हवा देने की ये कोशिश एक बदतरीन मिसाल है जिस पर तवज्जा देना हुकूमत का काम है। राजस्थान में कांग्रेस की हुकूमत है।

इस पर इल्ज़ाम है कि इस की हुक्मरानी के दौरान ही फ़िर्क़ा पुरसताना सरगर्मीयां आम होती हैं। वो एक तरफ़ सैक्यूलर अज़म का लुबादा ओढ़ कर मुस्लमानों से हमदर्दी का ड्रामा करती हैं तो दूसरी तरफ़ इस्लाम दुश्मन ताक़तों को खुली छूट दे कर उन्हें मुस्लमानों की दिल आज़ारी के लिए मौक़ा दिया जाता है। जयपुर लिटरेचर फ़ोर्म की कार्यवाहीयां सरासर इस्लाम दुश्मनी के मुतरादिफ़ हैं।

इस पर हुकूमत की ख़ामोशी इस के अहकाम और मुल्क के क़ानून की तौहीन है। सवाल ये है कि ममनूआ किताब को मंज़रे आम पर लाना ही ख़िलाफ़-ए-क़ानून है तो पुलिस ने इस वाक़िया पर ख़ामोशी इख़तियार क्यों की है। वैसे कांग्रेस और इस की पालिसीयों के बारे में मुस्लमानों को हमेशा धोका हुवा है। वो सैक्यूलर अज़म के नाम पर अपने खु़फ़ीया प्रोग्राम को अंजाम देती है।

मुल्क में अमन-ओ-अमान का तक़ाज़ा ये है कि यहां के मज़हबी जज़बाती और मज़हबी उमोर को ठेस पहुंचाने वालों को सज़ा दी जाय लेकिन कांग्रेस हुकूमत में ख़ातियों को सज़ा मिलने की तवक़्क़ो नहीं की जा सकती। दीगर फ़िर्कापरस्त पार्टीयों के लिए भी कांग्रेस ने काम आसान बना दिया है।

इसलिए मुल्क के सैक्यूलर अवाम को मौजूदा हुकूमत के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने में ताख़ीर नहीं करनी चाहीए ताकि हिंदूस्तान के सैक्यूलर मिज़ाज को आंच ना आने पाए।

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