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स्कूलो की बढ़ती हुई फ़ीस से सरपरस्तों की नींद हराम

हैदराबाद 21अप्रैल ।( मुहम्मद जसीम उद्दीन निज़ामी ) । अब वो दिन गए जब समाज के अह्ले ख़ैर और दरमनद हज़रात तालीमी इदारों का क़ियाम बुलंद मक़ासिद के तहत किया करते थे ,अब तालीम सिर्फ़ तिजारत बन कर रह गई है और जब से तालीम की दुकानें खुल गईं ,

हैदराबाद 21अप्रैल ।( मुहम्मद जसीम उद्दीन निज़ामी ) । अब वो दिन गए जब समाज के अह्ले ख़ैर और दरमनद हज़रात तालीमी इदारों का क़ियाम बुलंद मक़ासिद के तहत किया करते थे ,अब तालीम सिर्फ़ तिजारत बन कर रह गई है और जब से तालीम की दुकानें खुल गईं ,तलबा असातिज़ा और तालीम गाहों का ताल्लुक़ ख़ालिस माद्दी होकर रह गया …तालिब-ए-इल्म एक ग्राहक ,असातिज़ा पेशावर माहिरीन और तालीमगाह एक सुपर मार्किट बन गई. जहां से इस्तिफ़ादा के लिए अव्वलीन शर्त जेब में हज़ारों रुपय का होना ज़रूरी हो गया। दोनों शहरों के स्कूलों में गरमीयों की तातीलात अब शुरू होने वाली हैं।

इसके बाद हमेशा की तरह हर स्कूल अपने अपने कारनामों को सब से बेहतर साबित करते हुए ज़्यादा से ज़्यादा वालदैन और सरपरस्तों को राग़िब करने में मसरूफ़ हो जाऐंगे …मगर शहर के इन स्कूलों में हरसाल मुख़्तलिफ़ किस्म के फीसों में होने वाले बेतहाशा इज़ाफ़ा ने वालदैन और सरपरस्तों की कमरतोड़ कर रख दिए हैं ,हालत ये है कि अच्छा ख़ासा कमाने वाला मुतवस्सित तबक़ा भी इन स्कूलों में दाख़िला दिलाने से पहले दस बार सोचने पर मजबूर है । सत्तार बाग़ काले पत्थर के साकन सय्यद मुश्ताक़ अहमद ने नुमाइंदा सियासत को बता या कि हर साल फ़ीस में देढ़ सौ का इज़ाफ़ा किया जा रहा है , जबकि ख़ुद को कॉरपोरेट स्कूल साबित करने की दौड़ में शामिल स्कूलों में ये इज़ाफ़ा हज़ारों में किया जा रहा है ।

उन्हों ने कहा कि उनके दो लड़के और एक लड़की है जिसको नए सिरे से किताब ,कापी स्टेशनरी ,बैग‌ ,यूनीफार्मस के साथ साथ एडमीशन फ़ीस माहाना फ़ीस , टर्म फ़ीस, एगज़ाम फ़ीस,और मुख़्तलिफ़ किस्म के फ़ीसस के नाम पर औसतन फी कस 3ता हज़ार रुपय ख़र्च होते हैं ,हर साल स्कूल खुलते ही उनका घरेलू बजट बुरी तरह बिगड़ जाता है सितम ज़रीफ़ी ये है एक बच्चा जो गुज़शता साल दूसरी क्लास मैं था उसकी किताबें पहली क्लास में पढ़ने वाले बच्चे जवाब दूसरी क्लास में आ गए हैं, नहीं पढ़ सकते क्योंकि ये लोग हर साल निसाब तब्दील कर देते हैं । मज़ीद परेशानी की बात ये है हर स्कूल वालों की एक मख़सूस दुकान मुक़र्रर होती है और मुताल्लिक़ा स्कूल के ज़िम्मेदार उन्ही दुकानों से किताब कापी और दीगर चीज़ें ख़रीदने पुरासरार करते हैं चूँकि वहां से भी उन्हें कमीशन हासिल हो जाता है जबकि बाअज़ स्कूलों के अहाते ही स्टेशनरी की दुकान में तबदील होगए हैं। क़ानून हक़ तालीम के मुताबिक़ ग़ैर इमदादी स्कूलों में भी कमज़ोर और पसमांदा तबक़ात के बच्चों को 25%नशिस्तें फ़राहम करने का क़ानून है मगर इस पर एक फ़ीसद भी अमल नहीं हो रहा है ।

शमा टॉकीज़ जहांनुमा के क़रीब सुकूनत पज़ीर एक ख़ातून ने सियासत को बताया कि इसी इलाक़े के एक स्कूल में जब उन्हों ने अपनी ग़रीबी और मजबूरी का वास्ता देकर एडमीशन फ़ीस कम करने की गुज़ारिश की तो उन्हें जवाब मिला अगर हम लोग तुम्हारी ग़रीबी देख लेते बैठे तो हमारे को भी रोड पर आ जाना पडेगा जवाब स्कूल के इस चेयरमैन काहै जो उमूमन मिल्लत की तालीमी पसमांदगी का रोना रोते हैं और मिल्लत के ग़म में ग़ालिबान उन्हें नींद भी नहीं आती ।

खिलवत के क़रीब रिहायश पज़ीर एक शहरी मुहम्मद यूनुस ने जहांनुमा इलाक़े में मौजू एक स्कूल का हवाला देते हुए बताया कि वहां सिर्फ यूके जी और नर्सरी क्लास के बच्चों से मुख़्तलिफ़ किस्म के फ़ीसस के नाम पर मजमूई तौर पर सालाना 18ता 22हज़ार रुपय वसूल किया जाता है , जबकि एक ग़ैरमुस्लिम इंतिज़ामीया के तहत चलाए जा रहे स्कूल में ईल के जीता नर्सरी के लिए 50हज़ारता एक लाख रुपय सालाना वसूल किए जा रहे हैं। उन्हों ने कहाकि पुराने शहर के स्कूलों का जब ये हाल है तो नए शहर में मौजूद स्कूलों का क्या हाल होगा आप अंदाज़ा कर सकते हैं।

मसला ये है कि पहले से ही महंगाई से परेशान हाल सरपरस्तों केलिए बढ़ती हुई स्कूल फ़ीस ने उनकी ज़िंदगी अजीर्ण करदी ही।हालत ये होगई है कि अब ग़रीब तबक़ाही नहीं बल्कि मुतवस्सित तबक़ा केलिए भी इन महंगे स्कूलों में अपने बच्चों को तालीम दिलाना एक डरावना ख़ाब बनता जा रहा है।

सवाल ये है कि ये महंगे तरीन स्कूलस आज तक क्यों कोई ए पी जे अब्दुलकलाम ,मुहम्मद अली जौहर या मौलाना अब्दुलकलाम पैदा ना कर सके ? ।ख़ुद को सर सय्यद साबित करने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाने वाले कोई एक भी शाह फ़ैसल (आई ऐस टॉपर) पैदा ना कर सके हालाँकि ये वो शख़्सियात हैं जिनके वालदैन ने कभी भारी भरकम फ़ीस ,महंगी किताबें ,और सिर्फ अंग्रेज़ी मवाद उनके बस्तों में नहीं भरा , बल्कि ये उन स्कूलों और कॉलिजों के पैदावार हैं जिनके बानीयों के दिल में क़ौम वमलत की तरक़्क़ी के लिए सच्ची तड़प मौजूद थी …मगर आज मिल्लत की तालीमीपसमांदगी का रोना रो कर स्कूल और कॉलिजस क़ायम करनेवाली, मिल्लत को ही लौटने मेंमसरूफ़ हैं औरउन्हें कोई टोकने ,रोकने वाला नहीं ।

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