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स्टीफन हॉकिंग की घातक बीमारी ने भी विज्ञान में योगदान को नहीं रोक पाई, 50 साल से ज्यादा वक्त तक रहे बीमार

ब्रिटिश भौतिकशास्त्री स्टीफन हॉकिंग एम्योट्रॉफिक लैटरल स्लेरोसिस यानी एएलएस बीमारी के सबसे मशहूर पीड़ित थे। इस घातक न्यूरॉलजिकल बीमारी ने उनके शरीर को शक्तिहीन कर दिया लेकिन वह विज्ञान में उनके योगदान को नहीं रोक स्की।

आमतौर पर पीड़ित इस बीमारी की चपेट में आने के दो से तीन साल के भीतर दम तोड़ देते हैं लेकिन हॉकिंग एक दो नहीं, बल्कि पचास साल से ज्यादा वक्त तक इससे जूझते रहे और वो एक दुर्लभ अपवाद हैं।

इस न्यूरोडिजेनरेटिव स्थिति में दिमाग और स्पाइन कॉर्ड (मेरूरज्जू) के मोटर नर्व सेल्स पर हमला होता है जिसके कारण मांसपेशियों से संवाद और स्वैच्छिक गतिविधियों पर नियंत्रण खत्म हो जाता है। इसकी परिणति लकवे के रूप में सामने आती है।

शुरुआत में मांसपेशियां अकड़ जाती हैं, फिर धीरे धीरे कमजोरी बढ़ती जाती है, समय बीतने के साथ पीड़ित चलने, बोलने यहां तक कि सांस लेने की क्षमता भी खो देता है।

यह घातक स्थिति दुर्लभ है। आमतौर पर हर साल एक लाख में दो लोग इस बीमारी की चपेट में आते हैं और ज्यादातर ऐसे लोगों की उम्र 55 से 65 साल के बीच होती है।

2014 में इस बीमारी का नाम घर घर सुना जाने लगा जब “आइस बकेट चैलेंज” वायरल हुआ। इसमें लोग अपने सिर पर ठंडा पानी डाल कर वीडियो अपलोड कर रहे थे। इसका मकसद इस बीमारी के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाना था।

फिलहाल एएलएस का कोई इलाज या उपचार नहीं है जो इसे रोक सके, हालांकि इसके लक्षणों को कुछ हद तक नियंत्रित करने के कुछ विकल्प जरूर मौजूद हैं।

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