Wednesday , December 13 2017

स्त्री-विरोधी सोच और पद्मावती!

-सुभाषिनी सहगल अली-

यह लेख पद्मावती पर नहीं है। न उस पद्मावती पर है, जो जायसी के मन में चित्तौड़ की महारानी थीं और न ही यह भंसाली की पद्मावती पर है। पद्मावती के जीवन और मृत्यु पर बड़ा विवाद छिड़ा हुआ है, पर उसके बारे में एक तथ्य निर्विवाद है। वह आज जिंदा नहीं हैं। मेरा यह लेख राजस्थान में जिंदा रहने के लिए जूझती महिलाओं और बच्चियों के बारे में है। उनके बारे में भी है, जो जन्म लेने की कोशिश कर रही हैं। मुझे शुरुआत एक ऐसी महिला की दास्तान के साथ करनी पड़ रही है, जो जिंदा नहीं है।

उसकी मौत पांच सौ साल पहले नहीं, एक साल पहले हुई थी। उसका जन्म महल में नहीं, बीकानेर जिले के एक छोटे-से गांव में एक दलित परिवार में हुआ था। उसके पिता महेंद्र राम मेघवाल सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं। वह घर-घर जाकर लोगों को अपनी बेटियों को पढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करते थे। उनकी बेटी डेल्टा शिक्षिका बनना चाहती थी। उसका प्रवेश एक निजी बी.एड. कॉलेज में हो गया था। वह होस्टल में रहती थी, जहां अधिकारी उससे अपने कमरों में झाड़ू लगवाते थे। छुट्टियों में भी वह वहीं रहती थी। एक दिन उसे कमरे में सफाई के लिए बुलाया गया। उसके साथ बलात्कार हुआ और उसका शव कॉलेज के प्रांगण के कुएं में मिला।

एक साल बाद, उसकी बरसी में उसके रिश्तेदार तक नहीं आए। महेंद्र राम मेघवाल का सब कुछ बदल गया है। उसके दोनों बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी है। महेंद्र पहले सोचते थे कि शिक्षा से दृष्टि स्पष्ट हो जाती है, पर जब उसकी एक आंख ही इतनी बेरहमी से निकाल ली गई है, तो उसकी सोच बदल गई है। वह कहते हैं, ‘मैं बेटियों के मां-बाप से कहता हूं कि मरते वक्त अपनी बच्चियों का मुंह देखना चाहते हो, तो उन्हें पढ़ाने मत भेजना।’ डेल्टा की जब मौत हुई, तब उसकी उम्र सत्तरह साल थी। उसके नाम से कोई फिल्म नहीं बनेगी। उसकी हत्या के खिलाफ कोई तलवार नहीं उठेगी। उसका पिता अकेले इंसाफ की पथरीली मार्ग पर, धीरे- धीरे आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है।

राजस्थान में सबसे अधिक बाल विवाह होते हैं। अक्षय तृतीया पर नदियों के किनारे मेले लगते हैं और हजारों बच्चों का विवाह वहीं रचा दिया जाता है। पहले अक्षय तृतीया से पहले वहां बाल विवाह के खिलाफ अभियान चलाया जाता था। भंवरी देवी तो इस अभियान की शिकार भी बनाई गई। जब उन्होंने बाल विवाह रुकवाने का प्रयास किया, तो सामूहिक बलात्कार कर उन्हें ‘सबक सिखाने’ का काम किया गया। लगता है कि भंवरी ने नहीं, सरकार ने सबक सीखा और इस पूरे अभियान को समाप्त ही कर दिया।

राजस्थान में मातृ मृत्यु दर प्रति एक लाख पर 244 है, जिसकी बड़ी वजह बाल विवाह है। मातृ मृत्यु दर के मामले में राजस्थान देश के अग्रणी राज्यों में है। महिला शिक्षा के क्षेत्र में यह राज्य सबसे पीछे है। पंद्रह से सत्तरह वर्ष की आयु वर्ग की लड़कियों में केवल 72 फीसदी पढ़ने जाती है। वहां आज भी खाना पकाने के लिए लकड़ी का इस्तेमाल होता है। लकड़ियां बीनने के लिए महिलाओं को मीलों की दूरी तय करनी पड़ती है। लकड़ी जलने से जो धुआं उठता है, उससे उनके फेफड़े बर्बाद हो जाते हैं। वहां प्रति 1,000 लड़कों पर लड़कियों का अनुपात 888 है।

ठीक भी है। पैदा होने के बाद लड़कियां करेंगी भी, तो क्या? राजस्थान में तो रानियों के जीने-मरने का महत्व है। इनके जीने पर जब खुशी नहीं होती, इनके मरने पर जब कोई बरसी पर नहीं आता, तो फिर पैदा होने से फायदा भी क्या?

-माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य

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