Wednesday , December 13 2017

हज मुकम्मल इताअत-ओ-फ़रमांबर्दारी का अमली इज़हार

महबूबनगर के आज़मीन हज का एक तरबियती इजतिमा मस्जिद मुहम्मदी आमेना , मसदोस नगर में ज़ेर निगरानी मुक़ामी उलमाए इकराम-ओ-दाअएआन दीन मुतय्यन बतारीख़ 19 सितंबर को मुनाक़िद हुव‌ जिस को मुख़ातब करते हुए मौलाना ख़्वाजा नज़ीर उद्दीन सुबे ली नाज़िम ज

महबूबनगर के आज़मीन हज का एक तरबियती इजतिमा मस्जिद मुहम्मदी आमेना , मसदोस नगर में ज़ेर निगरानी मुक़ामी उलमाए इकराम-ओ-दाअएआन दीन मुतय्यन बतारीख़ 19 सितंबर को मुनाक़िद हुव‌ जिस को मुख़ातब करते हुए मौलाना ख़्वाजा नज़ीर उद्दीन सुबे ली नाज़िम जामिआ आईशा निस्वान हैदराबाद ने कहा के हज दरअसल दोनों तरह की कुर्बानियों जानी-ओ-माली सुपुर्दगी और मुकम्मल इताअत-ओ-फ़रमांबर्दारी का अमली इज़हार है ।

अपनी फ़र्र ज़य्यात-ओ-ख़ाहिशात से इंतेक़ाल करके जज़बा ललहेत से सरशार अल्लाह की मर ज़य्यात और अहकाम की ताबेदारी(फरमाबरदारी) का अमली नमूना-ओ-इक़रार बंदगी-ओ-इज़हार अबदीयत का नाम हज्ज-ए-मबरूर का समरा और हक़ीक़त है । उन्हों ने मनासिक( तरीका) हज और आदाब ज़ियारत मदीना मुनव्वरा पर तफ़सीली रोशनी डालते हुए आज़मीन हज को तसहीह(सफ्) नियत और सब्र-ओ-सुकून से तमाम मनासिक( तरीका) हज बजा लाने और हर अमल के आग़ाज़(सुरु)-ओ-इख़तताम(कतम)पर नुसरत ख़ुदावंदी को मांगने और क़बूलियत आमाल की ख़ुदाए बुज़ुर्ग बरतर से दा-ए-करने की नसीहत की ।

आज़मीन हज की कसीर( जियादा) तादाद ने इस तरबियती इजतेमा में शिरकत करने के बाद अपने कलबी(दिल) तास्सुरात(बात्) बयान करते हुए कहा के उन्हें इस बात का इलम ही नहीं था के वो हज जैसे अज़ीम उल-शान फ़रीज़ा की तकमील(पुर कर्न‌) केलिए आज़िम सफ़र हैं ।

क़बल अज़ीं इस इजतेमा को मुख़ातब करते हुए मौलाना मुहम्मद मुतीअ अलरहमन मिफताही सदर मुदर्रिस सिराज उल-उलूम-ओ-ख़तीब मस्जिद कौसर न्यू टाउन महबूबनगर ने फ़लसफ़ा हज और वाक़ाती पस-ए-मंज़र पर रोशनी डाली ।

ज़िलई रुकन शौरी तब्लीगी जमात जनाब हामिद रईस जो इस इजतेमा की निज़ामत के फ़राइज़ अंजाम दे रहे थे ने वाज़िह किया के हम जो कुछ बचपन में सीखे हैं जिस में काफ़ी झूल और कमियां पाई जाती हैं वो पचपन तक चलने का नहीं और ज़रूरत इस बात की है के आज़मीन हज बराह-ए-करम अपनी नमाज़ों को भी दरुस्त करें और मुस्तनद उल्मा इकराम हफ़्फ़ाज़ इकराम के हाँ बैठ कर और दाअएआन दीन के हमराह राह ख़ुदा में निकल कर अपनी बुनियादी खामियों(बुरैइ) को दूर करें और अपने हज को हज्ज-ए-मबरूर बनाएं ।

उन्हों ने सफ़र हज से पहले तमाम आज़मीन हज को अल्लाह के रास्ता में निकल कर सऊबतों (मुश्किल्) बुरा दश्त करने के आदी और बहतरीन अख़लाक़ हमीदा के हामिल बनने का मश्वरा दिया

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