Saturday , August 18 2018

हमारा कोई डीमांड नहीं , बस अच्छा शादीख़ाना और पुरतकल्लुफ़ खाना चाहीए

हैदराबाद 28 मार्च : हमारा कोई डीमांड नहीं बस शादीख़ाना वसीअ वो अरीज़ लिया जाए और शादी के दिन तमाम लवाज़िमात से भरपूर ताम ख़ास का इंतेज़ाम किया जाए ताकि शादी यादगार हो , वैसे भी हम आप से जहेज़ , जोड़े घोड़े की रक़म या गाड़ी का मुतालिबा

हैदराबाद 28 मार्च : हमारा कोई डीमांड नहीं बस शादीख़ाना वसीअ वो अरीज़ लिया जाए और शादी के दिन तमाम लवाज़िमात से भरपूर ताम ख़ास का इंतेज़ाम किया जाए ताकि शादी यादगार हो , वैसे भी हम आप से जहेज़ , जोड़े घोड़े की रक़म या गाड़ी का मुतालिबा नहीं कर रहे हैं बल्कि हमारी ख़ाहिश यही है कि शहर के मशहूर और मारूफ़ शादीख़ाना में शादी की तक़रीब मुनाक़िद हो और मेहमानों के हिसाब की डिशेस से तवाज़ो की जाए ताकि उन्हें मालूम हो कि हमारे बेटे की शादी किस शान और शौकत से की गई थी ।

ये अलफ़ाज़ आजकल शादी ब्याह की बात-चीत के दौरान सुनने में आ रहे हैं। दूसरी जानिब लड़की वाले जी अच्छा जी अच्छा और आप जैसा मुनासिब समझें कह कर ना चाहते हुए भी लड़के वालों के इन दो मुतालिबात को मानने पर मजबूर हो रहे हैं ।

क़ारईन ! आप भी सोचते होंगे कि लड़के वाले कितने भले हैं कि जहेज़ , जोड़ा घोड़ा का कोई मुतालिबा नहीं कर रहे हैं और ना ही नौशा के लिए मोटर सैकिल या कार मांगी जा रही है जब कि हक़ीक़त ये है कि बेहतरीन शादीख़ाना और हिमा इक़साम की डिशेस पर मुश्तमिल खाने के इंतेज़ाम पर बाआसानी 5 ता 6 लाख रुपये ख़र्च हो जाते हैं ।

लड़की वालों को इन दो मुतालिबात पूरा करने के लिए मजबूर करना कोई अच्छी बात नहीं है इन दो मुतालिबात के बाद लड़के वाले बड़े शान से कहने लगते हैं हम ने लड़की वालों से कुछ नहीं लिया । बिना जहेज़ के शादी की है जब कि वो ये भूल जाते हैं कि लड़की वालों की जानिब से शादी के मौक़ा पर दीए गए खाने और वसीअ और अरीज़ शादीख़ाने के इंतिख़ाब के नतीजा में उन के बेटे की शादी यादगार साबित हुई और मेहमानों में उन की वाह वाह हुई ।

उन फ़िक्रमंद शहरियों का ये भी कहना है कि शहर हैदराबाद और मज़ाफ़ाती इलाक़ों में शादी और वलीमे के मौक़ा पर सिर्फ़ एक डिश से ही मेहमानों की ज़ियाफ़त का दस्तूर बनाया जाना चाहीए ताकि लड़की और लड़के वालों किसी पर भी माली बोझ आइद ना हो क्यों कि अक्सर ये भी देखा गया है कि शादियों को यादगार बनाने के नाम पर लोग क़र्ज़ के दलदल में फंस जाते हैं और सूद दर सूद पर मबनी क़र्ज़ उन की ज़िन्दगियों को जहन्नुम बना देता है ।

आजकल एक और अहम बात ये नोट की जा रही है कि शादीयों में मुक़ामी शादी ख़ानों को बिलकुल नज़रअंदाज कर दिया जा रहा है अब तो महल्लों में वाक़े शादी ख़ानों को छोटी मोटी तक़ारीब के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है । ज़रूरत इस बात की है कि मुसलमान इस मसअला पर संजीदगी से तवज्जा दें और मुहल्लावारी सतह पर शादियों में सिर्फ़ एक डिश के लिए मुहिम चलाएं ताकि हमारा मुआशरा फुज़ूल खर्ची की लानत से महफ़ूज़ रह सके ।

अक्सर दर्दमंदान मिल्लत का कहना है कि ख़तीब साहिबान जुमा के मौक़ा पर अवाम में इस ताल्लुक़ से शऊर बेदार करें क्यों कि अख़बारात ना पढ़ने वालों को भी इस बुराई से दूर रहने में मदद मिल सके।

TOPPOPULARRECENT