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हम बेहतर की जगह बदतर होते जा रहे हैं: रविश कुमार

“मैंने जेल के भीतर अपनी ज़िंदगी के 8,150 दिन बिताये हैं। मेरे लिए ज़िंदगी ख़त्म हो चुकी है। आप जो देख रहे हैं वो एक ज़िंदा लाश है। “

क्या ये पंक्ति इतनी सामान्य है कि इसे पढ़ने के बाद किसी को फर्क़ ही नहीं पड़ा हो। जिस दिन के इंडियन एक्सप्रेस में मुज़ामिल जलील की यह कहानी छपी है उस दिन बेहतरीन संसाधनों और रिसर्च टीम से लैस मीडिया के नायंकर ( एंकर और नायक से मिलकर बना एक नया शब्द है) इस कहानी से बेख़बर रहे। इंडियन एक्सप्रेस तो सब पढ़ते हैं फिर भी इस बात से समाज, संस्था, मीडिया, राजनीति और पत्रकारों में शांति पसरी रही। इसका मतलब है कि अब हम सामान्य होने लगे हैं। एक आदमी जो ख़ुद को ज़िंदा लाश की तरह दिखाना चाहता है, हम उसकी लाश को देखकर सामान्य होने लगे हैं। हमें न तो मर चुके को देख कर फर्क पड़ता है न ही मरे जैसे को देखकर।

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निसार की कहानी तन्मय की कहानी से हार गई। तन्मय ने भारत रत्नों का कथित रूप से अपमान कर दिया था जिसे लेकर तमाम चैनलों की प्राइम रातें बेचैन हो गईं थीं। आख़िर वे भारत रत्न के साथ हुए अपमान को कैसे बर्दाश्त कर सकते थे। राष्ट्रपति के द्वारा मनोनित सांसद रियालिटी टीवी में फूहड़ हंसी हंसते हैं,सब बर्दाश्त कर लेते हैं। चुने गए सांसद साबुन तेल और शैंपू का विज्ञापन कर रहे हैं क्या किसी को फर्क पड़ता है। क्या किसी ने पूछा कि स्टुडियो में जितना घंटा देते हैं क्या ये सांसद जनता के बीच भी उतने ही आराम से बतियाते हैं। भारत रत्न से पुरस्कृत नायक पंखा घड़ी और लेमचूस का विज्ञापन करते हैं क्या किसी को फर्क पड़ता है। क्या भारत सरकार अपने भारत रत्नों के रहने-खाने का प्रबंध नहीं कर सकती जिससे उन्हें बिल्डलर से लेकर बर्तन तक का विज्ञापन न करना पड़े। मुझे नहीं मालूम कि भारत रत्नों की चिन्ता में ये सवाल आए या नहीं लेकिन मुझे तन्मय की हरकतों पर भी कुछ नहीं कहना है।

आज़ादी और ज़िम्मेदारी का मुद्दा चलता रहेगा। कुछ लतीफे अपमानजनक न भी हो तो इतने घटिया तो होते ही हैं कि सुनकर चुप रहा जाए। मगर इंटरनेट पर राजनीतिक रूप से गाली गलौज की संस्कृति को पचाने और नज़रअंदाज़ करने का लेक्चर देने वाले भी इस बहस में कूद पड़े। हो सकता है कि यह गंभीर मुद्दा हो और राष्ट्र की प्राइम रातों की हसीन चर्चाओं से इसका निपटारा हुआ हो लेकिन बिना किसी प्रमाणित सबूत के निसार की ज़िंदगी के 23 साल जेल में बीत गए। क्या उसके साथ जो मज़ाक हुआ वो किसी तन्मय के फूहड़ मज़ाक से कम भद्दा था। अगर हमें भद्दे मज़ाक की फिकर है तब तो फिर नासिर का ही मसला नायंकरों के मुखमंडलों पर छा जाना चाहिए था।

निसार-उद-द्दीन अहमद 23 साल पहले बाबरी मस्जिद ध्वंस की पहली बरसी पर हुए धमाके के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। इस घटना में दो यात्री मारे गए और 11 घायल हो गए थे। फार्मेसी के छात्र नासिर को पुलिस ने कर्नाटक के गुलबर्गा से उठा लिया। उसका भाई ज़हीर भी साज़िश के आरोप में उठा लिया गया। 23 साल तक जेल में रहा लेकिन पुलिस एक भी सबूत पेश नहीं कर पाई।

निसार ने कहा है कि वो 20 साल का था जब जेल में बंद कर दिया गया। आज 43 साल का है। तब उसकी छोटी बहन 12 साल की थी जिसकी शादी हो चुकी है। अब उसकी बेटी 12 साल की है। मेरी भतीजी एक साल की थी अबउसकी शादी हो चुकी है। मेरी रिश्ते की बहन मुझसे दो साल छोटी थी, अब वो दादी बन चुकी है। मेरी ज़िंदगी से एक पूरी पीढ़ी चली गई है।

15 जनवरी 1994 को उसे कर्नाटक के गुलबर्गा से उठाकर हैदराबाद लाया गया था। कर्नाटक पुलिस को भी पता नहीं था कि निसार को गिरफ्तार किया गया है। जब निसार के घरवालों को पता चला तो मुकदमा लड़ने की तैयारी में जुट गए। उसके पिता मुकदमा लड़ते लड़ते 2006 में चल बसे। ज़हीर को भी आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी मगर फेफड़े में कैंसर के कारण वो बाहर आ गया। वो कैंसर से लड़ता रहा और अपने भाई की बेगुनाही के लिए।

निसार को पहले पुलिस ने उसे हैदराबाद में 1993 में एक मुस्लिम संस्थान में हुए धमाके के आरोप में गिरफ्तार किया। बाद में दोनों भाइयों को कई और धमाकों में आरोपी बनाकर टाडा लगा दिया गया। इकबालिया बयान के दम पर पुलिस ने दावा किया कि निसार ने एपी एक्सप्रेस में बम रखने की बात कबूल कर ली है। कर्नाटक और हैदराबाद पुलिस जांच कर ही रही थी कि यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया। 21 मई 1996 को हैदराबाद की कोर्ट ने इन पर लगाए गए टाडा के प्रावधानों को हटा दिया और कहा कि बिना किसी गंभीरता के टाडा के प्रावधान लगा दिये गए हैं।

पत्रकार मुज़ामिल जलील को निसार ने बताया है कि डीसीपी के वी रेड्डी और इंस्पेक्टर बी श्यामा ने उसका बयान लिखवाया था, उस पर दस्तख़त तक नहीं थे। हैदराबाद के ट्रायल कोर्ट ने 2007 में ही सभी को छोड़ दिया था लेकिन उन्हीं इकबालिया बयानों के आधार पर निसार और 15 आरोपियों को अजमेर की टाडा अदालत ने आजीवन करावास सुना दी। क्या ये अजीब नहीं है कि एक सबूत एक कोर्ट के लिए बेकार है दूसरे कोर्ट के लिए आजीवन कारावास के लायक। दो राज्य के टाडा कोर्ट हैं। इतना अंतर कैसे आ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एफ मोहम्मद इब्राहीम कैफुल्ला और जस्टिस उदय उमेश ललित ने चारों आरोपियों के इकबालिया बयान को देखा और कहा कि इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। निसार की भूमिका न तो इकबालिया बयान से ज़ाहिर होती है न इसके खिलाफ अन्य दूसरे सबूत मिले हैं। 12 साल लग गए अजमेर की अदालत के फैसले को सुप्रीम कोर्ट से निरस्त कराने में। मैं इस स्टोरी को पढ़ते वक्त सन्न रह गया। निसार से ज़्यादा उन अफसरों और वकीलों के बारे में सोचने लगा। क्या उन अफसरों के हाथ नहीं कांपे होंगे, किसी बेगुनाह की ज़िंदगी बर्बाद करते हुए। इनके दिल और ईमान पर कोई बोझ पड़ता ही नहीं होगा।

बात सिर्फ निसार की नहीं है, किसी नरेश की भी हो सकती है। अगर यह निसार के लिए आसान है तो किसी नरेश को भी हुकूमतें हमेशा के लिए जेल में सड़ा सकती हैं। आखिर आम जनता किस संस्था की जांच या फैसले पर यकीन करे। उस ज़िंदा लाश का हम क्या करें जो 43 साल के निसार की शक्ल में बाहर आया है। हम देखें या न देखें। काश कि सुप्रीम कोर्ट आरोप मुक्त करने के साथ साथ उनसे भी सवाल करता जो इतने सालों तक बिना सबूत के किसी को जेल में सड़ाते रहे।

आए दिन ऐसे नौजवानों को जेल से रिहा होने की ख़बरें पढ़ता रहता हूं। न तो इनके लिए कांग्रेस बोलती है न बीजेपी न समाजवादी पार्टी। रिहाई मंच जैसी संस्था अपने दम पर लड़ती रहती है । जब कोई राजनीतिक दल बेकसूरों के हक में बोलने का साहस नहीं कर पाता है तो कैसे मान लें कि हिन्दू मुस्लिम मसले पर इनके बीच कोई समझौता नहीं है। जबकि इन्हीं बातों को लेकर देश में कितना हिन्दू मुसलमान विवाद हुआ। लोगों की ज़हन में कितना ज़हर घोला गया ।

क्या टीवी डिबेट से कुछ हल निकलेगा? क्या ये सारा कसूर चैनलों के डिबेट करने या न करने को लेकर है ? क्या हम ऐसी कोई व्यवस्था या किसी व्यवस्था में डिबेट से सुधार ला पाए हैं? टीवी चैनलों के डिबेट एक तरह से व्यवस्था और संस्था के वर्चुअल विकल्प बनते जा रहे हैं। व्यवस्था तो वही रहेगी चलो डिबेट में निपटाते हैं। वहां हम अपनी पसंद और नापसंद के आधार पर भड़ास निकाल लेते हैं। हर दिन एक नया डिबेट होता है। हर दिन एक नई कुश्ती होती है। हम बेहतर की जगह बदतर होते जा रहे हैं। नागरिक उदासीनता की पराकाष्ठा की मिसाल हैं ये बहसें ।

निसार को भी अपने बाकी बची लाश के साथ न्यूज़ चैनलों की प्राइम रातों के डिबेट देखने चाहिए। जीने के लिए कोई ज़रिया न भी हो तो मरने का ऐसा सहारा कहाँ मिलेगा। हम ऐसी कौन सी संस्था बना पाए जिसकी निष्पक्षता कांग्रेस बीजेपी के आने जाने से मुक्त हो। क्या कोई ऐसी संस्था है? क्या कांग्रेस अपने शासन के समय निसार के साथ जो हुआ उसकी ज़िम्मेदारी लेगी? क्या बीजेपी अक्षरधाम हमले में गिरफ्तार मुफ़्ती अब्दुल क़य्यूम की ज़िम्मेदारी लेगी जिसे एक ऐसे आरोपों में 11 साल जेल की सज़ा काटनी पड़ी जो साबित ही न हो सके। आप पाठक सोचिये कि हम ज़हर तो पी लेते हैं लेकिन क्या हम देख पाते हैं कि हिन्दू मुसलमान की सियासी पुड़िया के भीतर कितने बेकसूर हिन्दू मुसलमान चूरण की तरह इस्तमाल किये जा रहे हैं। नहीं देखना चाहते तो डिबेट देखिये।

साभार : naisadak.org

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