हिंदूस्तान में नशे का बढ़ता हुआ चलन अफ़सोसनाक

हिंदूस्तान में नशे का बढ़ता हुआ चलन अफ़सोसनाक
अलीगढ़, २६ जनवरी (यू एन आई) अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी के जे एन मेडीकल के मुमताज़ माहिर-ए-नफ़सीयत डाक्टर एसए आज़मी ने कहा है कि हिंदुस्तान में बढ़ते नशे का चलन निहायत अफ़सोसनाक है।

अलीगढ़, २६ जनवरी (यू एन आई) अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी के जे एन मेडीकल के मुमताज़ माहिर-ए-नफ़सीयत डाक्टर एसए आज़मी ने कहा है कि हिंदुस्तान में बढ़ते नशे का चलन निहायत अफ़सोसनाक है।

उन्हों ने कहा कि नशे की गोलीयों में मुख़्तलिफ़ इक़साम के कीमिया होते हैं जिन में एक तरह की नशीली चीज़ एल एस डी भी है जिसे मेलो सैनू जिन ग्रुप में रखा जाता है। उन्हों ने बताया कि इस के इस्तेमाल के मुज़िर असरात तो अपनी जगह लेकिन इस को छोड़ देने के बाद भी नफ़सियाती और दिमाग़ी परेशानीयों का सामना करना पड़ता है।

डाक्टर आज़मी ने बताया कि बरसों बाद भी एल एस डी, गांजा, भांग, चरस इस्तेमाल करने वाले अगर उसे छोड़ देते हैं तो कुछ दिन बाद भी किसी चीज़ की अद मे मौजूदगी में ऐसे अफ़राद को इस के मौजूद होने का एहसास होता रहता है जैसे किसी जानवर का नज़र आना जबकि वो मौजूद नहीं होता, जिस्म में तबदीली महसूस करना जैसी जिस्म का हल्कापन भारीपन महसूस करना, आज़ा का छोटा बड़ा महसूस होना, आँखों के सामने गोल, चौकोर, तिकोनी शक्लें दिखाई देना।

उसे ही फ़लीस बैक कहते हैं। उन्होंने बताया कि किसी तनाव की हालत में फ़लीस बैग जलदी उभर जाता है और ऐसी हालत में मरीज़ बेहद घबराया, डरा सहमा और बेचैन रहता है। डाक्टर एस ए आज़मी ने कहा कि ईलाज के लिए ऐसे मरीज़ से बात करके तसल्ली देना और उन्हें ये बता देना कि इस ने जो नशीली अशीया इस्तेमाल की थीं ये उन का देरपा असर और रद्द-ए-अमल है।

उन्होंने कहा कि इस के ईलाज में कुछ दवाएं देने की ज़रूरत होती है जिस के लिए माहिर तबीब और माहिर अमराज़ नफ़सियात से सलाह लेना बेहद ज़रूरी है।

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