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हिन्दू शरणार्थी को नागरिकता देने के लिए मोदी सरकार का मसौदा तैयार

नई दिल्ली। भारत सरकार के इस कदम को जितना मानवीय कहा जाएगा, शायद उतना ही राजनीतिक भी। दरअसल गृह मंत्रालय ने नागरिकता कानून में प्रस्तावित संशोधन का मसौदा तैयार कर लिया है। कहा जा रहा है कि संसद अगर इस संविधान संशोधन को पारित कर देती है तो धर्म के नाम पर भेदभाव की वजह से भारत आने वाले पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यक नागरिकों को ‘अवैध प्रवासी’ करार दिए जाने से छूट मिल सकती है।

नागरिकता कानून, 1955 में प्रस्तावित बदलाव भारत में रह रहे ऐसे शरणार्थियों एक कानूनी रास्ता देगा जिससे वे यहां की नागरिकता पर दावा कर सकेंगे। पाकिस्तान और बांग्लादेश में प्रतिकूल परिस्थितियों में रह रहे हिंदुओं के संरक्षक के तौर पर देखे जाने की मोदी सरकार की स्पष्ट चाहत इस कदम से जाहिर होती है।

पाकिस्तान और बांग्लादेश के दो लाख हिंदुओं को इससे फायदा होगा। उनकी अक्सर ये शिकायत रहती है कि उनके साथ ‘दोयम दर्जे के नागरिकों जैसा बर्ताव’ होता है और यहां तक कि उनके साथ हिंसा होने की संभावना भी बनी रहती है। वे अक्सर ईशनिंदा कानून के जाल भी फंस जाते हैं। एक और जहां हिंदू अल्पसंख्यकों की मदद करने का फैसला लिया गया है तो दूसरी ओर आर्थिक वजहों से बांग्लादेश से आने वाले मुस्लिम प्रवासियों को हतोत्साहित किया जा रहा है।

सरकार प्रवासियों का यही वर्गीकरण सोच समझ कर रही है। हालांकि इसके खतरे भी हैं कि उस पर हिंदुत्व के अजेंडे को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया जा सकता है। दुनिया भर में शरणार्थी की परिभाषा इसी तरह से तय की जाती है। पहला राजनीतिक और धार्मिक कारणों से शरण मांगने वाले लोग और दूसरा आर्थिक कारणों से देश छोड़ने वाले लोग।

यह वर्गीकरण राजनीतिक अजेंडे को भी सूट करता है, खासकर तब जबकि संघ परिवार भारत को हिंदुओं का प्राकृतिक घर मानता है। साल 2014 के लोकसभा चुनावों के पहले BJP ने इसे अपने घोषणापत्र में भी शामिल किया था।

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