Saturday , December 16 2017

हुसूल-ए-इल्म का शौक़ , एस्टेट सेन्ट्रल लाइब्रेरी के दरख़्तों के नीचे पढ़ते ये स्टूडेंट्स

नौख़ेज़-ओ-नौजवान नस्ल किसी भी मुलक-ओ-क़ौम का सरमाया होता है अगर नौजवान नस्ल ज़ेवर तालीम से आरास्ता हो इलम-ओ-हुनर में यकता हो और तख़लीक़ी सलाहियतों की हामिल हो तो फिर इस मुलक-ओ-क़ौम को तरक़्क़ी-ओ-ख़ुशहाली से दुनिया की कोई ताक़त नहीं

नौख़ेज़-ओ-नौजवान नस्ल किसी भी मुलक-ओ-क़ौम का सरमाया होता है अगर नौजवान नस्ल ज़ेवर तालीम से आरास्ता हो इलम-ओ-हुनर में यकता हो और तख़लीक़ी सलाहियतों की हामिल हो तो फिर इस मुलक-ओ-क़ौम को तरक़्क़ी-ओ-ख़ुशहाली से दुनिया की कोई ताक़त नहीं रोक सकती । इल्म आम आदमी को हक़ीक़त में इंसान बनाता है । उसे हराम-ओ-हलाल में तमीज़ सिखाता है ।

हवादिस-ए-ज़माना बदलते रुजहानात-ओ-रविष और करवटें लेती तहज़ीबों से वाक़िफ़ करवाता है । हम ने देखा कि शहर बल्कि रियासत की क़दीम और सब से बड़ी लाइब्रेरी ( कुतुब ख़ाना ) एस्टेट सेन्ट्रल लाइब्रेरी के एक हिस्सा में कुछ लड़के और लड़कियां बैठे बड़े ही पुरसुकून अंदाज़ में अपनी नज़रें किताबों पर मर्कूज़ किए हुए थीं वो मुताला में इस क़दर मुनहमिक थे कि लगता था उन्हें किसी और चीज़ की परवाह ही नहीं ।

राक़िम उल-हरूफ़ ने मुताला में ग़र्क़ इन बच्चों के तालीमी जुनून को देख कर सोचा कि क्यों ना क़ारईन को उन के इस बहतरीन जज़बा-ओ-जुनून से वाक़िफ़ करवाया जाये । आप को बतादें कि एस्टेट सेन्ट्रल लाइब्रेरी के अहाता के एक कोने में बैठे पढ़ रहे स्टूडेंट्स में से बेशतर का ताल्लुक़ मुख़्तलिफ़ अज़ला से है जब कि बाअज़ स्टूडेंट्स मज़ाफ़ाती इलाक़ों से आकर भी इस पुरसुकून माहौल में अपना मुस्तक़बिल संवारने में मसरूफ़ हैं।

हमारी ख़ुशी की इंतिहा उस वक़्त ना रही जब तलबाके इस ग्रुप में हमारी मुलाक़ात मुहम्मद मुज़फ़्फ़र हुसैन नामी लड़के से हुई उस लड़के ने एम बी ए किया है और सी ए करने का इरादा रखता है । फ़िलवक़्त वो मुलाज़मत की तलाश में है और जब भी वक़्त मिलता है मुताला के लिये एस्टेट सेन्ट्रल लाइब्रेरी पहूंच जाता है । दरख़्तों के नीचे बैठ कर पढ़ने के फ़वाइद पर भी उस लड़के ने रोशनी डाली ।

इस ने बताया कि वो संतोष नगर का रहने वाला है और वालिद बिज़नस मैन है वो एस्टेट सेन्ट्रल लाइब्रेरी का रुख़ इस लिये करता है कि यहां ना सिर्फ़ मुख़्तलिफ़ मौज़ूआत पर किताबें बाआसानी मिल जाती हैं बल्कि दूसरों को पढ़ता देख कर ख़ुद में भी पढ़ने का शौक़ पैदा होता है । महबूबनगर से ताल्लुक़ रखने वाले सिरीधर ने बताया कि अफ़ज़ल गंज एक एसा मुक़ाम है जहां बसों की सहूलत है ।

जैसे ही वो महबूबनगर से अफ़ज़ल गंज पहूँचता है फ़ौरी लाइब्रेरी में चले जाता है । जहां सुबह से शाम तक मुताला के बाद घर को वापसी अमल में आती है इन में से कई लड़के लड़कियां टिफिन लाया करती हैं जब कि उन्हें यहां किताबों के साथ अख़बारात पढ़ने का मौक़ा भी मिलता है । करीमनगर के रहने वाले मुहम्मद इदरीस क़ाज़ी पूरा की एक मस्जिद के कमरा में अपने 4 ता 5 दोस्तों के साथ रहते हैं और नमाज़ फ़जरकी अदाएगी के साथ ही सब अपनी अपनी तालीमी सरगर्मियों में मसरूफ़ हो जाते हैं।

इस लड़के ने बताया कि लाइब्रेरी के सामने चमन की मस्जिद में नमाज़की अदाएगी के बाद मुताला ही इन का काम होता है । उन्हों ने बताया कि वो आई ए एस बनने का इरादा रखते हैं और उम्मीद है कि वो अपने ज़राअत पेशा वालिद और माँ के ख़ाबों को पूरा करेगा। इस लड़के ने बताया कि जो लड़के किताबें खरीदने से क़ासिर होते हैं एस्टेट सेन्ट्रल लाइब्रेरी उन के लिये नेअमत गैर मुतरक़्क़बा है ।।

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