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हेमंत सोरेन झारखंड के वज़ीर ए आला

रांची, 13 जुलाई: झामुमो के लीडर हेमंत सोरेन ने आज राजभवन में हुए एक तकरीब में वज़ीर ए आला के ओहदे की हलफ ली। इसके साथ ही वह रियासत के नौवें वज़ीर ए आला बन गए। रियासत की कमान संभालने के बाद वह कैबिनेट की पहली बैठक भी करेंगे।

रांची, 13 जुलाई: झामुमो के लीडर हेमंत सोरेन ने आज राजभवन में हुए एक तकरीब में वज़ीर ए आला के ओहदे की हलफ ली। इसके साथ ही वह रियासत के नौवें वज़ीर ए आला बन गए। रियासत की कमान संभालने के बाद वह कैबिनेट की पहली बैठक भी करेंगे।

इससे पहले राजभवन में हलफ बरदारी की इस तकरीब की तैयारी जुमे के दिन से चलती रही। रांची के डिप्टी कमिश्नर भी तकरीब की तैयारियों का जायजा लेने पहुंचे। रियासत की मखलूत हुकूमत का चीफ बनने के साथ ही अब झामुमो की कमान भी बिलावास्ता तौर पर हेमंत सोरेन के हाथ में होगी। हालांकि, अभी इसका कोई बाकायदा ऐलान नही हुआ है, लेकिन मौजूदा हालात बताता है कि अब झामुमो में ज़्यादातर फैसले हेमंत सोरेन ही ले रहे हैं।

मुंडा हुकूमत से ताईद की वापसी के बाद अब कांग्रेस-राजद की मदद से हुकूमत की कमान संभालने का फैसला इसका सुबूत है। सतही तौर पर झामुमो को रियासत में तीन बार इक्तेदार पर काबिज होने का मौका मिला। इस दौरान कमान पार्टी चीफ शिबू सोरेन के हाथ में रही, लेकिन 11 सितंबर 2010 को सीधे डिप्टी चीफ मिनिस्टर की कुर्सी तक पहुंचने वाले हेमंत सोरेन अब झारखंड के वज़ीर ए आला के साथ-साथ झामुमो का भी नया चेहरा होंगे।

एक मायने में उन्हें पार्टी की सियासी विरासत सौंप दी गई है और इस लिहाज से कहा जा सकता है झामुमो के चुनाव निशान तीर-धनुष की कमान अब उन्हीं के हाथों में है। हेमंत के लिए यह टास्क चुनौतियों से भरा हुआ है और उन्हें यह भी साबित करना है कि सिर्फ सियासी विरासत के बूते वह टिके हुए नहीं हैं।

तंज़ीमी महाज़ पर उनके वालिद शिबू सोरेन झारखंड के सबसे कद्दावर लीडर रहे हैं, लेकिन इक्तेदार के मोर्चे पर उनको हमेशा पटखनी खानी पड़ी।

वह वज़ीर ए आला की कुर्सी पर रहते हुए जिमनी इंतेखाबात तक हार गए। हेमंत के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस मिथक को तोड़ने की है कि झामुमो को हुकूमत चलाने की तकनीक नहीं आती। हालांकि, हेमंत सोरेन तंज़ीमी मोर्चे पर खास करामात नहीं कर पाए हैं, लेकिन हाल के महीनों में उन्होंने कुछ कड़े फैसले लिए।

इसमें बीजेपी की अनदेखी कर इलेक्शन में अपना उम्मीदवार देना, अर्जुन मुंडा सरकार से ताईद वापस लेना और साफ तौर पर पार्टी का एजेंडा सामने रखना शामिल है।

उन्होंने ये तमाम फैसले लेकर यह इशारे देने की कोशिश की है कि वह ढुलमुल तरीके से तंज़ीम चलाने के बजाय अपने एजेंडे को कारगर तौर पर लागू करेंगे। हुकूमत तंज़ीम की बागडोर साथ-साथ रहने से उन्हें दो मोर्चे पर जूझना पड़ेगा और यही उनका पहला चैलेंज होगा कि खुद को साबित कर दिखाएं वरना नाकामयाबी का टुकड़ा भी उन्हीं के मत्थे फूटेगा।

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