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हैदराबाद में रोज़गार के बेशुमार मवाक़े मौजूद

नुमाइंदा ख़ुसूसी- शहर हैदराबाद ने अपने दरवाज़े गैर हैदराबादी अफ़राद के लिए हमेशा से ही खुले रखे हैं । हैदराबाद की मेहमान नवाज़ी , अख़लाक़ , मुरव्वत और जज़बा हमदर्दी सारे मुल्क में अपनी मिसाल आप है । यही वजह है कि बैरून हैदराबाद या

नुमाइंदा ख़ुसूसी- शहर हैदराबाद ने अपने दरवाज़े गैर हैदराबादी अफ़राद के लिए हमेशा से ही खुले रखे हैं । हैदराबाद की मेहमान नवाज़ी , अख़लाक़ , मुरव्वत और जज़बा हमदर्दी सारे मुल्क में अपनी मिसाल आप है । यही वजह है कि बैरून हैदराबाद या रियासत के बाहर से जो भी यहां आया हमेशा हमेशा के लिए इस प्यारे मुहब्बत अमन-ओ-आश्ती के शहर का हो कर रह गया । इस सरज़मीन की और इस के पानी की ये खासियत मशहूर है कि एक मर्तबा कोई यहां अगर आजाए तो दुबारा अपने आबाई मुक़ाम को जाना नहीं चाहता । ये रुजहान सिर्फ आज का ही नहीं बल्कि क़ुतुब शाही , आसिफ़ जाहि हुकमरानों के दौर-ए-इक्तदार से ही यहां मौजूद है ।

माज़ी में दक्कन की ख़ुशहाली का ये हाल था कि लोग बैरून ममालिक से भी यहां आकर रोज़गार से मुंसलिक होजाते थे । सब से अहम बात ये थी कि हुकमरान वक़्त भी काबिल लोगों की ना सिर्फ भरपूर हौसला अफ़्ज़ाई करते बल्कि उन की पज़ीराई भी की जाती । आज हमारा शहर ग़नजान आबादी के हामिल इलाक़ा में तब्दील होगया । इस के बावजूद हैदराबाद तहज़ीब मुख़्तलिफ़ तहज़ीबों में भी अपनी मुनफ़रिद शनाख़्त बनाए हुए है । हम अपने क़ारेईन से इस ज़िमन में गुफ़्तगु करते हुए एसी ही एक मिसाल पेश करने जा रहे हैं कि इस बंदा ख़ुदा ने परवरदिगार आलम की अता करदा अक़ल को बरुए कार लाते हुए अपने लिए रोज़गार का बहतरीन ज़रीया तलाश किया है । महबूब नगर का मुतवत्तिन अनजया नीलू है ।

हम ने देखा कि गच्ची बावली में सड़क के किनारे एक ग़ैरमामूली सजी सजाई कैंटीन पर एक नौजवान पोदीना का पानी और छांच (Butter Milk) बेच रहा है । ख़ूबसूरत रंगीन फ्लैक्स बोर्डस पर उन अशिया-की गिलास की तस्वीर और कीमत फ़ी गिलास दस रुपये प्रिंट की गई है । करीब पहूंच कर पहले तो हम ने एक गिलास पोदीना का पानी खरीदा जो वाक़ई ज़ाइक़ादार था और बड़े ही सलीका और ख़ुशअख़लाक़ी के साथ प्लास्टिक की गिलास में सरबराह किया गया । हम ने जब इस कैंटीन का बग़ौर जायज़ा लिया तो बड़ी हैरत हुई कि ये तो एक टाटा मैजिक है । जिस को Modify करते हुए कैंटीन की शक्ल दे दी गई है ।

इस मैजिक के पहिये , असटरेनग और ड्राइविंग सीट बरक़रार रखी गई है जब कि दीगर तमाम सीटें निकाल दी गई हैं । रात को कारोबार बंद करने पर ये Mobile Canteen यहां से चली जाती है । हम ने मुनासिब समझा कि इस नौजवान से गुफ़्तगु करें । दरयाफ़त करने पर मालूम हुआ कि 20 साला अनजया नीलू जो महबूबनगर का मुतवत्तिन है और नवीं जमात तक तालीम हासिल करचुका है । अनजया नीलू ने बताया कि यौमिया आसानी से 500 रुपये कमा लेता है । हम ने ये देखा कि यहां आने वाले ग्राहकों की अक्सरियत दौलतमंद अफ़राद की है । जो यहां से गुज़रते हुए तवक्कुफ़ कर के ये मशरूब पीते हैं ।

अनजया नीलूने बताया कि इन में अक्सर अफ़राद उसके मुस्तक़िल गाहक हैं और ये तक़रीबन दो साल से ये कारोबार कर रहा है । रोज़ाना ओस्तन दो हज़ार रुपये का कारोबार होता है जिस में ओस्तन ख़ालिस आमदनी 500 रुपये यक़ीनी रहती है । मज़ीद ये कि ख़ूबसूरती से सजाई गई इस गाड़ी के इलावा पास ही प्लास्टिक का एक बड़ा सा कूड़ा दान भी रखा गया है और ग्राहकों से दरख़ास्त की जाती है कि गिलासों को कूड़ा दान ही में फेंकें । सड़क पर नहीं । अवाम की आमद-ओ-रफ़त के औक़ात को मल्हूज़ रखते हुए राजू अपनी कैंटीन इसी इलाक़े में क़ुरब-ओ-ज्वार चार कीलो मीटर हदूद में मुंतक़िल करता रहता है ।

इस ने हमें बताया कि करीब ही में एक मकान किराया पर हासिल क्या हुआ है जिस का किराया 2000 रुपये है हम ने ये भी अंदाज़ा लगाया कि टाटा मैजिक गाड़ी में इस तरह ज़रूरी तब्दीलियों Modification पर कोई ज़्यादा ख़र्च भी नहीं आया है । इन तमाम तफ़सीलात के साथ जब हम वहां से रवाना हुए तो हसब-ए-आदत हमारे ज़हन ने हम को झंझोड़ना शुरू कर दिया कि काश हमारे हैदराबादी नौजवान भी अपनी अक़ले सलीम का सही इस्तिमाल करते हुए कुछ एसा ही करने पर ग़ौर करते । हम ये देखते हैं कि हमारे अक्सर नौजवान जो किसी भी वजह से अपनी तालीम मुकम्मल करने में नाकाम रहे हैं वो किसी ना किसी शोरूम या दूकान में मुलाज़मत इख्तेयार कर लेते हैं ।

जहां उन्हें तीन सा साढे़ तीन हज़ार रुपये माहाना तनख़्वाह मिलती है और वो ये तसव्वुर करने लगते हैं कि उन्हों ने बहुत बड़ा कारनामा अंजाम दे दिया है । जब कि हक़ीक़त ये है कि इसी तरह पूरी उम्र गुज़र जाती है और कोई ख़ास तरक़्क़ी या तबदीली उन की ज़िंदगी में रौनुमा नहीं होपाती क्यों कि उन्हें अपनी बहनों की शादियां करते हुए फिर ख़ुद अपनी शादी के बाद हाल ये होता है कि वक़्त से पहले बूढ़े नज़र आने लगते हैं । महदूद आमदनी और अख़राजात की बोहतात आजकल किसी बीमारी से कम नहीं या फिर हमारे बाअज़ नौजवान ख़लीजी मुलक सुधारने में सरगरदां मुख़्तलिफ़ एजैंटों के दफ़ातिर का चक्क्र काटते हुए अपनी उम्र और मुस्तक़बिल दोनों ही ज़ाए करते नज़र आते हैं ।

अगर ख़ुशक़िसमती से किसी ख़लीजी मुल्क जाने का मौक़ा भी मिल जाय तो वहां तरह तरह की मुश्किलात झेलनी पड़ती हैं । आप ने बारहा बाअज़ एसे नौजवानों की ज़बानी ये सुना होगा कि कफील अच्छा नहीं था । रेगिस्तान में ऊंटों की चरवाही और देख भाल का काम करते हुए नासाज़गार मौसम के बाइस बीमारी लाहक़ होगई वगैरह वगैरह हमारे उन नौजवानों को अगर एसा ही कोई कारोबार करने का मश्वरा दिया जाता है तो मायूब समझते हुए साफ़ कह देते हैं कि भला ये काम हम कैसे करेंगे जब कि ख़लीजी ममालिक जाकर बेशुमार सख़्तियां झेलते हुए हर किस्म का काम करने पर मजबूर होजाते हैं

तो फिर अपने वतन में अपने घर वालों से करीब रहते हुए एसा ही कोई रोज़गार पैदा करने की फ़िक्र क्यों नहीं करते जब कि बैरून हैदराबाद अज़ला-ओ-दीगर रियासतों से आने वाले अफ़राद हमारे वतन हैदराबाद को दुबई और ख़लीजी मुलक तसव्वुर करते हुए माहाना हज़ारों कमा रहे हैं । क़ारईन हमारे वतन अज़ीज़ की सरज़मीन काफ़ी ज़रख़ेज़ है यहां भी रोज़गार के बेशुमार मवाक़े मौजूद हैं सिर्फ अक़ल सलीम का इस्तिमाल करते हुए सही सिम्त पेशरफ़्त करनी होगी । बाक़ौल अल्लामा इक़बाल ।। ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बड़ी ज़रख़ेज़ है साक़ी

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