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क़ानून हक्के मालूमात पर नज़रसानी की ज़रूरत नहीं

नई दिल्ली। 17 अक्टूबर (पी टी आई)। हक्के मालूमात क़ानून (आर टी आई) पर बढ़ते हुए मुबाहिस के दरमयान वज़ीर-ए-क़ानून सलमान ख़ुरशीद ने ये वाज़िह करदिया कि इस क़ानून पर दुबारा नज़र-ए-सानी करने की कोई तजवीज़ नहीं है। अलबत्ता उन्हों ने इस बात की निशान

नई दिल्ली। 17 अक्टूबर (पी टी आई)। हक्के मालूमात क़ानून (आर टी आई) पर बढ़ते हुए मुबाहिस के दरमयान वज़ीर-ए-क़ानून सलमान ख़ुरशीद ने ये वाज़िह करदिया कि इस क़ानून पर दुबारा नज़र-ए-सानी करने की कोई तजवीज़ नहीं है। अलबत्ता उन्हों ने इस बात की निशानदेही की कि ना सिर्फ हुकूमत बल्कि अदलिया को इस क़ानून के बाइस मुश्किल तरीन तजुर्बात से गुज़रना पड़ रहा है। हमें हक्के मालूमात क़ानून पर फ़ख़र है और इस मुल्क को आर टी आई देने पर हम मुतमइन हैं। अगरचे कि इस क़ानून से मुल्क में कई हालात ग़ैर मुवाफ़िक़ बन रहे हैं, लेकिन हम इस क़ानून को बरक़रार रखते हुए ना मुसाइद (मुश्किल) हालात का सामना करने तैय्यार हैं। उन्हों ने कहा कि हमें इस क़ानून पर अमल आवरी को यक़ीनी बनाना होगा। हुकूमत के मॶसर पन और कारकर्दगी को मुस्तहकम बनाने केलिए ये क़ानून ज़रूरी है। इस सवाल पर कि आया आर टी आई पर नज़रसानी की जाएगी? सलमान ख़ुरशीद ने कहा कि ऐसी कोई तजवीज़ नहीं है। उन्हों ने कहा कि हम इस क़ानून में फ़िलहाल कोई तबदीली नहीं ला रहे हैं, अगर मुस्तक़बिल में हालात का तक़ाज़ा हो तो तबदीली लाई जा सकती है। कल के बारे में आज में कुछ नहीं कह सकता। वज़ीर-ए-क़ानून ने ताहम इस बात को मुस्तर्द करदिया कि क़ानून में बुनियादी तबदीलीयां लाई जा रही हैं। अगर आप कहते हैं कि क़ानून में बुनियादी तबदीलीयां लाई जाएंगी, मेरा जवाब यही है कि नहीं। हमें इस क़ानून पर फ़ख़र है। सी बी आई को भी इस क़ानून के तहत लाने से इस्तिस्ना दिए जाने का सवाल पैदा होरहा है। वकील से सियासतदां बनने वाले सलमान ख़ुरशीद ने कहा कि कोई क़ानून मुकम्मल नहीं होता। आई टी आई के ताल्लुक़ से बाअज़ सवालात का जवाब देते हुए कि वज़ारत फ़ीनानस की जानिब से हाल ही में पी ऐम ओ को लिखे गए मकतूब की वजह से तनाज़ा पैदा हुआ है, इसी तरह के तनाज़आत के बारे में उन्हों ने कहा कि हुकूमत और अदलिया को आर टी आई से हासिल होने वाले इन्किशाफ़ात पर मुश्किलात होरही हैं। फिर भी इस क़ानून को बरक़रार रखा जाएगा। बिलाशुबा हम जानते हैं कि हुकूमत ही वाहिद नहीं होती है बल्कि इस हुकूमत से सियासतदां भी वाबस्ता हैं। इसी लिए उन्हें मुश्किलात का सामना है। ब्यूरोक्रेट्स को भी इस क़ानून से मुश्किलात होंगी। आज़ाद एजैंसीयां भी मुश्किलात महसूस कररही हैं। अदालतें भी मुश्किलात से दो-चार हैं। अपने नुक्ता को वाज़िह करते हुए उन्हों ने कहा कि हाई कोर्टस और सुप्रीम कोर्ट से सवालात किए गए हैं और उन से इस्तिफ़सार किया गया है कि वो अपने फ़ैसलों के मुसव्वदे फ़राहम करें। जजस से ये भी सवाल किया गया कि इन के फ़ैसले का मुसव्वदा किस तरह तैय्यार किया गया? और क़तई फ़ैसला मोख़र करने की वजह क्या थी? ये भी मुतालिबा है कि बाअज़ जजस की कारकर्दगी का भी इस क़ानून के ज़रीया जायज़ा लेना चाहती है।

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