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क़ुरआन मजीद और इस्लाह-ए-मआशरा

तमाम किस्म की हम्द‍ ओ‍ सना उस रब्बुल आलमीन के लिए लायक़-ओ-ज़ेबा है, जिसने हम को पैदा किया और हमारी हिदायत-ओ-रहनुमाई के लिए अंबिया-ए-किराम अलैहिस्सलाम को मबऊस फ़रमाया। ज़िंदगी गुज़ारने, मआशरा की इस्लाह और फ़लाह-ओ-बहबूदी के लिए क़ुरआन को न

तमाम किस्म की हम्द‍ ओ‍ सना उस रब्बुल आलमीन के लिए लायक़-ओ-ज़ेबा है, जिसने हम को पैदा किया और हमारी हिदायत-ओ-रहनुमाई के लिए अंबिया-ए-किराम अलैहिस्सलाम को मबऊस फ़रमाया। ज़िंदगी गुज़ारने, मआशरा की इस्लाह और फ़लाह-ओ-बहबूदी के लिए क़ुरआन को नाज़िल फ़रमाया। इसी कलाम ए पाक में इरशाद है: हम तुम्हारे पास ऐसी किताब भेज चुके हैं जिसमें तुम्हारे लिए नसीहत मौजूद है, क्या फिर भी तुम नहीं समझते।

इस तरह अल्लाह तआला ने हम को इस बात की तरफ़ मुतवज्जा किया है कि हम अपने हाल-ओ-चाल के लिए इसके इस सहीफ़ा समावी को जो इसने आख़िरी आसमानी सहीफ़ा के तौर पर अपने आख़िरी नबी पर उतारा अपने पेशे नज़र रखें कि इसमें हमारी ज़िंदगी के लिए रहबरी फ़रमाई है।

ये रहबरी इस उम्मत के लिए है, जो नबी आख़िरी उज्ज़मां स०अ०व० की उम्मत कहलाती है। इस उम्मत के इलावा दीगर उम्मतों में दीन को अपने तौर पर अक़ीदा-ओ-इबादत तक महिदूद समझा गया है, लेकिन उम्मत मुहम्मदिया के लिए दीन सिर्फ़ मज़कूरा दो पहलोओं तक महिदूद नहीं रहा, बल्कि ज़िंदगी के दीगर पहलोओं पर भी मुश्तमिल रखा गया है।

इस में आपस के ताल्लुक़ात, एक दूसरे के हुक़ूक़, दोस्ती और दुश्मनी की हदूद, ज़ुल्म-ओ-ज़्यादती और इसी तरह के दीगर मुआमलात सब दीन के ज़मुरा में आते हैं, जबकि इन सारे मुआमलात में हमें क़ुरआन मजीद से रहबरी मिलती है। क़ुरआन मजीद की मुख़्तलिफ़ सूरतों में जगह जगह इन उमोर के सिलसिले में तवज्जा भी दिलाई गई है।

इस्लाम ने इंसान को इजतिमाई निज़ाम से जोड़ा था, लेकिन मग़रिब ने फ़र्द की आज़ादी का दिलफ़रेब नारा देकर इंसानों को ख़ानों में बांट दिया। एक इंसान का ताल्लुक़ दूसरे इंसान से सिर्फ़ कारोबार बन कर रह गया है।

बाअज़ सफ़र करने वालों ने बताया कि इंगलैंड में जगह जगह बोर्ड पर लिखा हुआ मिला कि Mind your own business” यानी आप अपना काम कीजिए।

इस्लाम ने बेशक आज़ादी की इजाज़त दी है, लेकिन इसके हदूद मुतय्यन किए हैं। एक आदमी को खाने की इजाज़त है, लेकिन दूसरों से छीन कर नहीं और ज़रूरत से ज़्यादा नहीं। आज समाजी ख़राबियां इस मुताल्लिक अल ऐनान आज़ादी की रुकन बन चुकी हैं, जिसने इंसानों को जानवर बना दिया है, बुराईयां फ़ैशन बनती जा रही हैं और आज़ादी के नाम पर उन पर दुबैज़ पर्दे डाल दिए जाते हैं।

समाज अफ़राद से बनता है, इजतिमाईयत मुहब्बत-ओ-सुलूक से पैदा होती है। अफ़राद जब तक अपने अंदर मुहब्बत-ओ-ईसार ना पैदा करें, उस वक़्त तक इजतिमाईयत नहीं पनप सकती। इसके लिए सिर्फ़ अपनी लज़्ज़त, अपनी राहत और अपनी दौलत का फ़लसफ़ा छोड़ना लाज़िमी है। समाज को सही रुख़ पर लाने की ज़रूरत का एहसास और इंसानों को इंसान बनाने का जज़बा जब तक नहीं पैदा होगा, उस वक़्त तक हालात में तब्दीली नहीं आ सकती।

हद से बढ़ती हुई माल की मुहब्बत, इसराफ़-ओ-फुज़ूलखर्ची, नाम-ओ-नमूद की हिर्स, बेहयाई, लज़्ज़त अंदोज़ी के बेजा जज़बात, ये सब वो बुराईयां हैं जिन्होंने आज पूरी दुनिया को अपने शिकंजे में जकड़ लिया है और इससे भी बढ़कर ख़तरे की बात ये है कि बुराई को बुराई कहने वाले ख़त्म होते जा रहे हैं और अगर कोई अच्छी तबीयत का शख़्स हिम्मत भी करता है तो दस अफ़राद उसकी हिम्मत तोड़ने के लिए खड़े हो जाते हैं।

इस्लाम भाई चारगी को बढ़ावा देता है, ख़ैर को फैलाता है, ख़ैर फैलाने वालों की हिम्मत अफ़्ज़ाई करता है और बुराईयों पर रोक लगाता है। इस्लाम ने दुनिया में ज़िंदगी गुज़ारने का एक ऐसा इजतिमाई निज़ाम पेश किया है, जिसमें हर तबक़ा के लिए भलाई है।

इक़तिसादी निज़ाम से लेकर मआशरती और अख़लाक़ी निज़ाम तक इसमें एक तरफ़ कुछ आज़ादी दी गई है और दूसरी तरफ़ ऐसे हदूद मुतय्यन किए गए हैं कि इंसान इंसानियत का भ्रम क़ायम रखे। अपने अख़लाक़-ओ-किरदार का ऐसा नमूना पेश करे, जिससे ये मालूम हो कि उसकी सोच कुछ और है और इसके लिए ये दुनिया ही सब कुछ नहीं है, बल्कि वो एक दूसरी ज़िंदगी को सामने रख कर जीता है।

ज़िंदगी की लगाम इसके हाथ में है। ख़ाहिशात उसको नहीं चलातीं, बल्कि वो ख़ाहिशात को चलाता और उन पर क़ाबू रखता है। उसकी हैसियत हाकिम की है, महकूम की नहीं। वो अपने नफ्स का ग़ुलाम नहीं है, बल्कि नफ्स की बागडोर इसके हाथ में है।

इजतिमाई ज़िंदगी के उसूल जब भी बनाए जाएंगे, इसमें हर एक का ख़्याल रखना होगा, हर तबक़ा को इसका हक़ देना होगा।
क़ुरआन मजीद अल्लाह तआला का आख़िरी कलाम है, जिसको अल्लाह ने दुनिया में बसने वाले तमाम इंसानों के लिए अपने आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद स०अ०व०पर उतारा है।

इसको हुदललिलनास (लोगों के लिए हिदायत) भी कहा गया है और दूसरी जगह इसको हुदललिलमुत्तक़ीन (मुत्तक़ियों के लिए हिदायत) भी कहा गया है। क़ुरआन मजीद में सबसे ज़्यादा ज़ोर इस्लाह अक़ीदा के बाद इस्लाह मआशरा पर दिया गया है।

समाजी और अख़लाक़ी बुराईयों को दूर करने की जगह जगह तलक़ीन की गई है। इन्फ़िरादी और इजतिमाई हुक़ूक़-ओ-मुआमलात को बड़ी अहमीयत के साथ बयान किया गया है।

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