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क़ुरआन में कसरत अज़्वाज की इजाज़त मगर हौसला अफ़्ज़ाई नहीं

नई दिल्ली, 02 जनवरी: (पी टी आई )एक शादीशुदा शख़्स के साथ एक लड़की का ज़बरदस्ती निकाह करवाने के मुल्ज़िम एक मौलवी को ज़मानत माक़बल गिरफ़्तारी मंज़ूर करने से दिल्ली की एक अदालत ने इनकार करते हुए कहा कि शरई क़ानून कसरत अज़्वाज की इजाज़त देता है ल

नई दिल्ली, 02 जनवरी: (पी टी आई )एक शादीशुदा शख़्स के साथ एक लड़की का ज़बरदस्ती निकाह करवाने के मुल्ज़िम एक मौलवी को ज़मानत माक़बल गिरफ़्तारी मंज़ूर करने से दिल्ली की एक अदालत ने इनकार करते हुए कहा कि शरई क़ानून कसरत अज़्वाज की इजाज़त देता है लेकिन इसके लिए ख़ुसूसी हालात की शर्त भी आइद करता है।

अदालत ने दिल्ली के मौलवी मुस्तफ़ा राजा को राहत रसानी से इनकार करते हुए इन दलायल को मुस्तर्द कर दिया कि शरई क़ानून के बमूजब मर्द को बैयकवक्त चार बीवीयां रखने की इजाज़त है। एडीशनल सेशन जज कामीनी ने कहा, इन मुआमलात में जहां पहली बीवी की रजामंदी हासिल हो मर्द दुबारा शादी कर सकता है और इसका हवाला कसीर ज़ौजगी के तौर पर दिया जाता है।

एक ज़ेली फ़िर्क़ा कसीर ज़ौजगी की शादियां करता है । क़ुरआन मजीद मुस्लिम मर्द को एक से ज़ाइद ख़ातून से बैयकवक्त ( आज़म तरीन हद चार ) रिश्ता-ए-इज़दवाज की इजाज़त देता है लेकिन ऐसे रवैय्या की हौसलाअफ़्ज़ाई नहीं करता। अदालत ने ये भी कहा कि कसरत अज़्वाज की मख़सूस हालत में बिशमोल शौहर के इंतेक़ाल या इसके अपनी बीवी को छोड़ देने की सूरत में जबकि उसको मददगार दीगर ज़राए मौजूद ना हो, इजाज़त है लेकिन ऐसे मुआमले में बिलउमूम हौसलाअफ़्ज़ाई नहीं की जाती।

पुलिस के बमूजब राजा ने एक लड़की की शादी ज़बरदस्त मुल्ज़िम नदीम ख़ान से गुज़श्ता साल मर्ज़ी के ख़िलाफ़ और इसके वालदैन की ग़ैरमौजूदगी में करवा दी थी जबकि मुतास्सिरा लड़की की इसके मुबय्यना शौहर ने इस्मत रेज़ि की थी । नदीम ख़ान की पहली बीवी के तीन बच्चे हैं। इसने अपनी पहली बीवी से दूसरी शादी की रजामंदी भी हासिल नहीं की थी।

ये लड़की जिसकी ज़बरदस्ती शादी करवाई गई थी, नदीम ख़ान की गिरफ्त से बच निकली और इसने अपने वालदैन को मकान पहुंच कर इस वाक़िया की इत्तिला दी थी। अदालत ने पेशगी ज़मानत की दरख़ास्त मुस्तर्द करते हुए कहा कि कसरत अज़्वाज के अमल पर कई मुस्लिम मुमलकतों और ममालिक में यातो तहदीदात आइद कर दी गई हैं या फिर इम्तिना आइद किया गया है।

हिंदूस्तान जैसी फ़राख़ दिल जमहूरीयत में ऐसे अमल की हौसलाअफ़्ज़ाई नहीं की जा सकती। अदालती फ़ैसले में कहा गया कि एक मर्द को मज़ीद बीवी (या बीवीयां) हासिल करने से पहले अपनी मौजूदा बीवी या बीवीयों से रजामंदी हासिल करना चाहीए । जज ने ये भी कहा कि शरई क़ानून के तहत कसरत अज़्वाज की समाजी फ़र्ज़ के एक हिस्से के तौर पर और फ़लाही मक़ासिद के लिए और बेसहारा अफ़राद को सहारा देने के मक़सद से इजाज़त दी गई है ।

मौलवी राजा की ग़लती की संगीन नौईयत के मद्द-ए-नज़र जज ने कहा कि उन्हें ज़मानत की दरख़ास्त मंज़ूर करने की कोई बुनियाद नज़र नहीं आती और पेशगी ज़मानत की दरख़ास्त मुस्तर्द की जाती है ।

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