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‘क़ौमी जुर्म के मुर्तक़िब’ पर सुप्रीम कोर्ट का सख़्त रद्द-ए-अमल

नई दिल्ली, 08 फ़रवरी: (पी टी आई) बाबरी मस्जिद की शहादत के मुक़द्दमा में सी बी आई के बयान पर कि बी जे पी के सीनीयर क़ाइद एल के आडवानी और दीगर ने एक क़ौमी जुर्म का इर्तिकाब किया है, सुप्रीम कोर्ट के सख़्त रद्द-ए-अमल की वजह बना।

नई दिल्ली, 08 फ़रवरी: (पी टी आई) बाबरी मस्जिद की शहादत के मुक़द्दमा में सी बी आई के बयान पर कि बी जे पी के सीनीयर क़ाइद एल के आडवानी और दीगर ने एक क़ौमी जुर्म का इर्तिकाब किया है, सुप्रीम कोर्ट के सख़्त रद्द-ए-अमल की वजह बना।

अदालत ने सी बी आई से कहा कि वो ऐसी ज़बान उस वक़्त तक इस्तेमाल ना करे जब तक कि मुक़द्दमा का फ़ैसला ना हो जाए। जस्टिस एच एल दत्तू की ज़ेर-ए-क़ियादत बेंच ने ये तब्सिरा उस वक़्त किया जब सीनीयर एडवोकेट पी पी राव ने जो सी बी आई की जानिब से पैरवी कर रहे हैं, ने कहा कि बी जे पी और विएचपी क़ाइदीन क़ौमी साज़िश में शामिल हैं। जिसकी अक्कासी रथ यात्रा से होती है और ये एक क़ौमी जुर्म है।

पी पी राव का बयान ख़ुसूसी सी बी आई अदालत और इलहाबाद हाइकोर्ट की जानिब से बी जे पी क़ाइदीन अडवानी, कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार और मुरली मनोहर जोशी के ख़िलाफ़ साज़िश के इल्ज़ामात से दस्तबरदारी का फ़ैसला सुनाए जाने के बाद उस को चैलेंज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के इजलास पर सामने आया।

दीगर अफ़राद जिनके ख़िलाफ़ इल्ज़ामात से दस्तबरदारी इख्तेयार की गई है इन में सतीश प्रधान, पी आर बंसल, अशोक सिंघल, गिरी राज , साध्वी , वि एच डालमिया, महंत नाथ , जगदीश मनी महाराज, बी एल शर्मा, निरुतिया गोपाल दास, धर्म दास, सतीश नागर और मोरेश्वर सावी थे।

दलायल की समाअत के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बंच ने सी बी आई से ख़ुसूसी अदालत में समाअत की ताख़ीर और दोनों अदालतों के फ़ैसलों को चैलेंज करते हुए अपील दाख़िल करने में ताख़ीर के बारे में भी सवाल किया। बेंच ने कहा कि आपका कहना है कि ये क़ौमी एहमीयत का मुक़द्दमा है फिर आप कैसे कह सकते हैं कि (अदालत के रिकार्ड) के तर्जुमे के लिए कई दिन लग गए और मुक़द्दमा दाख़िल करने में तीन माह का वक़्त लगा।

सी बी आई ने कहा कि उसे ताज़ा हलफनामा दाख़िल करने की इजाज़त दी जाये ताकि वो इसका मौक़िफ़ बेंच के सामने पेश कर सके। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ये दरख़ास्त मुस्तर्द कर दी और कहा कि कोई ताज़ा हलफ़नामा या मवाद बेंच पर पेश करने की इजाज़त नहीं दी जाएगी।

ताहम बेंच ने सी बी आई को इजाज़त दी कि वो ख़ुसूसी अदालत और हाइकोर्ट के फ़ैसलों में जिन दस्तावेज़ात का तज़किरा किया गया है वो बेंच पर पेश करे। अदालत ने मुक़द्दमा की समाअत 13 फ़रवरी तक मुल्तवी कर दी जबकि पी पी राव ने मुक़द्दमा की फाईल्स के मुताला के लिए कुछ मोहलत तलब की।

क़ब्लअज़ीं 6 दिसंबर 2012 को सुप्रीम कोर्ट ने राय बरेली की अदालत को हिदायत दी थी कि बाबरी मस्जिद की शहादत का मुक़द्दमा अडवानी और दीगर के ख़िलाफ़ तेज़ रफ़्तार से समाअत किया जाये। सी बी आई ने सुप्रीम कोर्ट से रुजू होकर इलहाबाद हाइकोर्ट के 21 मई 2010 के फ़ैसले को चैलेंज किया था जिसमें क़ाइदीन के ख़िलाफ़ इल्ज़ामात से दस्तबरदारी के ख़ुसूसी अदालत के फ़ैसला की तौसीक़ की गई थी।

उस वक़्त हाइकोर्ट ने ताहम सी बी आई को इजाज़त दी थी कि अडवानी और दीगर के ख़िलाफ़ राय बरेली की अदालत में पेशरफ़्त की जा सकती है। इसी अदालत के दायराकार में शहीद इमारत (बाबरी मस्जिद) शामिल है। 2010 के हाइकोर्ट के हुक्मनामा में कहा गया था कि सी बी आई की नज़रसानी दरख़ास्त की कोई बुनियाद नहीं है।

ख़ुसूसी अदालत के 4 मई 2001 के हुक्मनामा के तहत क़ाइदीन के ख़िलाफ़ मुजरिमाना साज़िश के इल्ज़ामात वापस ले लिए गए थे। दो मुक़द्दमात जिनमें से एक अडवानी और दीगर के ख़िलाफ़ जो दिसंबर 1992 में जबकि बाबरी मस्जिद शहीद की गई थी, राम कथा कुंज के शहि नशीन पर मौजूद थे।

दूसरा मुक़द्दमा लाखों नामालूम कारसेवकों के ख़िलाफ़ है जो मुतनाज़ा इमारत के अतराफ़ और अंदर मौजूद थे। सी बी आई ने अडवानी और दीगर 20 अफ़राद के ख़िलाफ़-ए-क़ानून ताज़ीरात-ए-हिंद की दफ़आत 153A (तबक़ात के दरमियान दुश्मनी को फ़रोग़ देना) , 153B (मावराए अदालत इल्ज़ामात और बयानात जो क़ौमी यकजहती के ख़िलाफ़ थे) और 505 (झूठे बयानात, अफ़्वाहें वग़ैरा जो अमन आम्मा में ख़ललअंदाज़ी या बग़ावत की वजह बनने के इरादा से दिए गए थे या फैलाए गए थे) बादअज़ां दफ़ा 120B (मुजरिमाना साज़िश) के इल्ज़ाम से दस्तबरदारी इख्तेयार कर ली गई थी जबकि ख़ुसूसी अदालत ने इल्ज़ामात को ख़ारिज कर दिया था और ख़ुसूसी अदालत के इस फ़ैसला की हाइकोर्ट ने तौसीक़ की थी।

मुल्ज़िमीन की फ़हरिस्त से बाल ठाकरे का नाम उनकी मौत के बाद हज़फ़ कर दिया गया था। ख़ुसूसी अदालत के फ़ैसला की तौसीक़ करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि सी बी आई ने किसी भी वक़्त राय बरेली में मुक़द्दमा की समाअत के दौरान या नज़रसानी शूदा दरख़ास्त की समाअत के दौरान कभी ये नहीं कहा था कि क़ाइदीन मुजरिमाना साज़िश के मुर्तक़िब हैं।

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