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ख़्वातीन के लिए उम्रकैद की सजा 14 साल काफी

मुंबई, 20 मार्च: महाराष्ट्र की जेल में बंद खातून कैदियों के लिए उम्रकैद की सजा पूरी करने के लिए 14 साल की मुद्द्त काफी है। जबकि मर्दों को 14 से लेकर 28 साल तक जेल की सलाखों के पीछे गुजारने होते हैं।

मुंबई, 20 मार्च: महाराष्ट्र की जेल में बंद खातून कैदियों के लिए उम्रकैद की सजा पूरी करने के लिए 14 साल की मुद्द्त काफी है। जबकि मर्दों को 14 से लेकर 28 साल तक जेल की सलाखों के पीछे गुजारने होते हैं।

बांबे हाई कोर्ट के जस्टिस अभय थिप्से और पीवी हरदास ने 15 मार्च को कत्ल के इल्ज़ाम में उम्रकैद की सजा काट रही उषा उपाध्याय की दर्खास्त पर यह फैसला सुनाया है।

जस्टिस थिप्से और जस्टिस पीवी हरदास ने कहा कि हमारे ख्याल में 2010 गाइडलाइंस की कटेगरी 1 में ख्वातीन के सभी जुर्म आ जाते हैं और यह मामला भी इसी कतेगरी में फिट बैठता है।

इसलिए हम 4 सितंबर, 2012 को महाराष्ट्र हुकूमत की तरफ से दिए हुक्म पर रोक लगाते हैं। दर्खास्तगुजार को 2010 गाइडलाइंस की कटेगरी 1(बी) के तहत रखकर ही उसे रिहा करने पर गौर किया जाना चाहिए।

हालांकि हुकूमत की तरफ अरुणा पाई ने दलील दी कि खातुन एक सुपारी किलर है और इसलिए उसे ज्यादा कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

उषा उपाध्याय ने रियासती हुकूमत के फैसले को चुनौती देते हुए मर्कज़ी हुकूमत के हुक्म/ हिदायत के मुताबिक मुकर्रर सजा से पहले जेल से रिहा होने की मांग की थी।

दर्खास्तगुज़ार 10 फरवरी, 1999 से जेल में है और अब तक 13 साल की सजा काट चुकी है। जब उसे सजा सुनाई गई थी, तो उस वक्त 1992 के सिम्त हिदायतो को बुनियाद बनाया गया था, लेकिन बाद में 2010 में तरमीम गाइडलाइंस तय किए गए।

2010 के सिम्त हिदायत दिशा निर्देश के जुमरे 6(ए) के तहत कैदी को कम से कम 28 साल जेल में बिताने होते हैं जबकि 1992 के सिम्त हिदायत के जुमरे 5(बी) में भी यही शर्त है।

उषा उपाध्याय का कहना है कि उसे गलत जुमरे में रखा गया है और वह 2010 गाइडलाइंस की कटेगरी 1(बी) के तहत रखे जाने की हकदार है। इसके तहत वक्त से पहले रिहा होने की काबलियत जेल में 14 साल की सजा है।

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