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ग़ालिब की ग़ज़ल: फिर कुछ इस दिल की बेक़रारी है…

मिर्ज़ा ग़ालिब

फिर कुछ इस दिल को बेक़रारी है
सीना ज़ोया-ए-ज़ख़्म-ए-कारी है

फिर जिगर खोदने लगा नाख़ुन
आमद-ए-फ़स्ल-ए-लालाकारी है

क़िब्ला-ए-मक़्सद-ए-निगाह-ए-नियाज़
फिर वही पर्दा-ए-अम्मारी है

चश्म-ए-दल्लल-ए-जिन्स-ए-रुसवाई
दिल ख़रीदार-ए-ज़ौक़-ए-ख़्वारी है

दिल हवा-ए-ख़िराम-ए-नाज़ से फिर
महश्रिस्ताँ-ए-बेक़रारी है

जल्वा फिर अर्ज़-ए-नाज़ करता है
रोज़-ए-बाज़ार-ए-जाँसुपारी है

फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है

फिर खुला है दर-ए-अदालत-ए-नाज़
गर्म बाज़ार-ए-फ़ौजदारी है

दिल-ओ-मिज़्गाँ का जो मुक़दमा था
आज फिर उस की रूबक़ारी है

बेख़ुदी बेसबब नहीं “ग़ालिब”
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है

(मिर्ज़ा ग़ालिब)

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