Saturday , December 16 2017

ग़ुर्बत में नुमायां कमी : मंसूबा बंदी कमीशन

ग़ुर्बत के ताय्युन के लिए साबिक़ा मुतनाज़ा तरीक़े पर क़ायम रहते हुए मंसूबा बंदी कमीशन ने आज कहा कि शहरी और देही इलाक़ों में सतह ग़ुर्बत से नीचे ज़िंदगी गुज़ारने वालों की तादाद में नुमायां कमी हुई है।

ग़ुर्बत के ताय्युन के लिए साबिक़ा मुतनाज़ा तरीक़े पर क़ायम रहते हुए मंसूबा बंदी कमीशन ने आज कहा कि शहरी और देही इलाक़ों में सतह ग़ुर्बत से नीचे ज़िंदगी गुज़ारने वालों की तादाद में नुमायां कमी हुई है।

कमीशन के मुताबिक़ सतह ग़ुर्बत से नीचे ज़िंदगी गुज़ारने वाले अफ़राद की तादाद 2004-05 में 37.2 से कम होकर 2011-12 में 21.9 फ़ीसद होगई है। उसकी वजह फी कस आमदनी और ख़र्च में इज़ाफ़ा है। कमीशन ने बताया कि देही इलाक़ों में ग़ुर्बत के ताय्युन के लिए तेंडुलकर तरीक़ेकार इख़तियार किया गया है, जिसके मुताबिक़ देहातों में माहाना फ़ी क़िस्सा मदनी 816 रुपये और शहरों में फी कस 1000 रुपये है। इसका मतलब ये है कि अगर शहरों में किसी शख़्स के पास फी कस आमदनी और ख़र्च के लिए रक़म 33.33 रुपये और देहातों में 27.20 रुपये से ज़ाइद हो तो इस का शुमार ग़रीबों में नहीं होता।

इससे पहले मंसूबा बंदी कमीशन ने ये कहते हुए एक तनाज़ा खड़ा कर दिया था कि देही इलाक़ों में यौमिया 32 रुपय कमाने वाला शख़्स ग़रीब नहीं है। ग़ुर्बत के ताय्युन के लिए इख़तियार किये गये तरीका-ए-कार पर तमाम सियासी जमातों ने नुक्ताचीनी करते हुए उसे ग़ैर हक़ीक़त पसंदाना और मौजूदा हक़ायक़ से बईद क़रार दिया था।

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