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फ़िल्मों में अब हिंसा और सेक्स के अलावा कुछ भी नहीं..

बचपन में होश आने के बाद मैंने अपनी पहली फ़िल्म जो सिनेमा हॉल में देखी वो माधुरी दीक्षित और सलमान खान की मश्हूर ‘हम आपके हैं कौन’ थी. मुझे याद है हम हॉल के गेट पे खड़े थे और टिकेट खिड़की पे इस तरह से भीड़ लगी थी मानो कुछ फ़्री में मिल रहा हो, लाइन पूरी तरह बिखर चुकी थी और लोग बस किसी तरह खिड़की तक पहुँचने की कोशिश कर रहे थे, इसी कोशिश में एक शख्स उन सब के ऊपर चढ़ गया और सांप बन कर एक दूसरे को क्रॉस करते हुए वो खिड़की तक पहुँच गया… ऐसे नज़ारे उस ज़माने में कॉमन थे लेकिन मैंने वो पहली बार देखा था. फ़िल्म देखने हमारे साथ एक आंटी भी गयी थीं और उनकी दो बेटियाँ भी, हम भी तीन भाई थे और हमारी अम्मी.. हमें कुल मिला कर जो टिकेट चाहिए थे बालकनी के लेकिन सिर्फ़ तीन ही बालकनी के मिले जबकि बाक़ी फर्स्ट के और वो भी पहली वाली लाइन के और आंटी की बेटियों को और हमारे बड़े भाईसाब को मिल गयी बालकनी की सीट, हम बैठे फर्स्ट में.. मेरा ख़याल है जिसने भी फर्स्ट में फर्स्ट सीट पे फ़िल्म देखी है वो जानता है या जानती है कि पहली लाइन में फ़िल्म देखना क्या होता है.
बहरहाल सिनेमा हॉल में फ़िल्म देखने का पहला अनुभव कुछ ऐसा रहा कि भूले नहीं भूलता. असल में उस वक़्त ये सब आम था, लोग जुनून के साथ फ़िल्म देखा करते थे और मज़े करते थे. कुछ इसी तरह का माहौल मैंने कुछ कुछ होता है फ़िल्म के वक़्त भी देखा, शाह रुख़ खान का वो कुछ ऐसा दौर था कि उनका नाम बिकता था हालाँकि उनकी फ़िल्में अच्छी भी होती थीं. बिना वजह की गंदगी से आज़ाद और एक बेहतर संगीत की फ़िल्में उस वक़्त शाह रुख ने दीं. इस दौर में शाह रुख़ के इलावा सलमान खान, आमिर खान, अजय देवगन, अक्षय कुमार भी काफी मशहूर रहे, बाद में हृतिक रौशन जैसे सितारों ने अच्छा काम किया लेकिन 2005 के बाद जो भी नया काम हुआ है उसमें अच्छा काम ढूँढने से ही मिलता है. फिर भी वो दौर एक बेहतर दौर ही था.

और आजकल जो माहौल है वो यूं है कि लोग फ़िल्म देखने मॉल जाते हैं और जो भी फ़िल्म उन्हें मिल जाए देख लेते हैं. कुछ इसी तरह का माहौल आजकल के गानों का है वो क्यूँ बनते हैं कुछ पता नहीं है.. सोनाक्षी सिन्हा गाने लगी हैं और मज़े की बात है कि अगर यू ट्यूब की मानें तो उनके गाने को सुनने वाले लाखों में नहीं करोड़ों में हैं.
पिछले कुछ सालों में फिल्मों के स्तर में आई गिरावट चिंता की बात है, आजकल जिस क़िस्म की फ़िल्में बन रही हैं उसमें हिंसा-सेक्स के सिवा कुछ पाना मुश्किल होगा.
(अरग़वान रब्बही)

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