Friday , December 15 2017

“साहब मैं मर रहा हूँ, मुझे बचा लो”

उस्मानिया जेनरल हॉस्पिटल का क़ियाम हुज़ूर निज़ाम नवाब मीर उसमान अली ख़ान बहादुर ने बिला लिहाज़ मज़हब, रंग, नस्ल और ज़ात पात बीमारों के ईलाज और मुआलिजा के लिए अमल में लाया था और बरसों तक इस तारीख़ी हॉस्पिटल के दरवाज़े गरीब मरीज़ों के लिए खुल

उस्मानिया जेनरल हॉस्पिटल का क़ियाम हुज़ूर निज़ाम नवाब मीर उसमान अली ख़ान बहादुर ने बिला लिहाज़ मज़हब, रंग, नस्ल और ज़ात पात बीमारों के ईलाज और मुआलिजा के लिए अमल में लाया था और बरसों तक इस तारीख़ी हॉस्पिटल के दरवाज़े गरीब मरीज़ों के लिए खुले थे लेकिन अब ऐसा लगता है कि हॉस्पिटल का इंतेज़ामीया इस तारीख़ी दवाखाने के बानी के मक़ासिद को फ़रामोश कर चुका है। यही वजह है कि बाअज़ मजबूर और बेबस और बेसहारा बीमारों को इस हॉस्पिटल में शरीक करने से इनकार किया जा रहा है।

राक़िमुल हुरूफ़ ने आज दवाख़ाना उस्मानिया का दौरा किया, देखा कि पार्किंग लॉट में एक इंतिहाई कमज़ोर शख़्स वहां पड़ा है और बड़ी मुश्किल से हरकत कर रहा है। हॉस्पिटल में मौजूदगी के बावजूद उस की ख़तरनाक हालत के बारे में जानने की कोशिश की जिस पर इन्किशाफ़ हुआ कि इस 40 साला शख़्स का नाम अनील है। दरअसल वो गुलबर्गा से ताल्लुक़ रखता है ताहम गुज़िश्ता 15 ता 20 बर्सों से हैदराबाद में मुक़ीम है। करीब में एक दुकान में काम कर के गुज़ारा करता था लेकिन एक माह क़ब्ल उसे टी बी हो जाने के बाइस इस दवाख़ाना के करीब लाकर छोड़ दिया गया तब से अब तक उसे देखने वाला कोई नहीं।

अनील ने बताया कि वो डॉक्टरों से रुजू हुआ लेकिन हॉस्पिटल के अमला ने उसे बाहर निकाल दिया उस ने डॉक्टरों से इल्तिजा की कि कम अज़ कम कुछ दवाएं दी जाएं लेकिन इस बीमार को दवा से भी महरूम रखा गया जिस के नतीजे में अनील चलने फिरने से भी क़ासिर है। दो चार क़दम चलते ही उसे चक्कर सी आ जाती है। हम ने देखा कि अनील इस क़दर कमज़ोर हो गया है कि वो बात चीत भी बड़ी मुश्किल से कर रहा था। इस ने ये भी बताया कि दवाख़ाना उस्मानिया का अमला उन के साथ बड़ी बेदर्दी के साथ पेश आया जिस पर उन की आँख से आँसू रवां हो गए।

उस गरीब और लाचार शख़्स ने मज़ीद बताया कि डॉक्टर और अमला आधार कार्ड और साथ में किसी को लाने पर ज़ोर दे रहे हैं जब कि शहर में उस के कोई रिश्तेदार नहीं और इस हालत में वो गुलबर्गा भी नहीं जा सकता।

बाअज़ अफ़राद ने बताया कि अनील जिस के यहाँ मुलाज़िम था उस का फ़रीज़ा बनता है कि इस का ईलाज करवाए लेकिन इस बात पर अनील बताता है कि उस शख़्स ने उसे हॉस्पिटल पहुंचाया और फिर वापिस नहीं आया। अनील यही चाहता है कि उसे हॉस्पिटल में भर्ती किया जाए वो जीना चाहता है। सवाल ये पैदा होता है कि तक़रीबन 30 एकड़ अराज़ी पर क़ायम उस हॉस्पिटल में लावारिस मरीज़ों के लिए 30 बिस्तर नहीं डाले जा सकते।

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