राज्यपाल का बयान दुखद, नागरिकता कानून पर नहीं किया कोई असंवैधानिक काम: केरल विधानसभा स्पीकर

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केरल विधानसभा में नागरिकता कानून के खिलाफ प्रस्ताव पास करने पर राज्यपाल की आलोचना का स्पीकर ने दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। केरल विधानसभा स्पीकर पी श्रीरामकृष्णन ने कहा है कि हमने अपनी सीमाओं और संवैधानिक दायित्वों के परे जाकर कोई काम नहीं किया है। हमें संविधान के मूल्यों को बनाए रखने का अधिकार है, सीएए अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन है। ऐसे में राज्यपाल का बयान दुर्भाग्यपूर्ण है।

नागरिकता कानून के खिलाफ राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पारित किए जाने को लेकर केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने गुरुवार को कहा है कि ये प्रस्ताव असंवैधानिक है, इसकी कोई कानूनी वैधता नहीं है। ऐसे इसलिए क्योंकि नागरिकता केंद्र का विषय है, इसलिए इसका वास्तव में कुछ महत्व नहीं है। अब इस पर केरल विधानसभा के स्पीकर ने जवाब दिया है।

केरल की विधानसभा ने नागरिकता संशोधन कानून को रद्द करने की मांग करते हुए राज्य विधानसभा में मंगलवार को एक प्रस्ताव पारित किया है। केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने नागरिकता कानून को रद्द करने की मांग करते हुए राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पेश किया, जिसे पारित कर दिया गया। प्रस्ताव में कहा गया है कि ये कानून संविधान के धर्मनिरपेक्ष नजरिए और देश के ताने-बाने के खिलाफ है और इसमें नागरिकता देने में धर्म के आधार पर भेदभाव होगा। ऐसे में इसे वापस लिया जाए। विधानसभा में 31 दिसंबर, 2019 को प्रस्ताव एक के मुकाबले 138 मतों से पास किया गया है।

इससे पहले केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद भी केरल विधानसभा में नागिरकता कानून के खिलाफ प्रस्ताव पास किए जाने पर एतराज जता चुके हैं। प्रसाद ने कहा कि नागरिकता केंद्र का अधिकार क्षेत्र है और ये बहुत स्पष्ट तौर पर लिखा हुआ है। ऐसे में राज्य विधानसभा में कैसे इस पर प्रस्ताव लाया जा सकता है। केरल के सीएम को किसी अच्छे कानून के जानकार से सलाह लेनी चाहिए।

बता दें कि दिसंबर, 2019 में संसद से पास हुए विवादित नागरिकता संशोधन कानून का देश के कई हिस्सो में काफी विरोध हो रहा है। असम, मेघालय, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के कई शहरों में इस कानून के खिलाफ निकाले गए जुलूसों में हिंसा भी हुई है। 20 से ज्यादा लोगों की मौत प्रदर्शनों में हो चुकी है। इस कानून में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिंदू, जैन, सिख, बौद्ध, पारसी और ईसाई समुदाय के शरणार्थियों को नागरिकता का प्रस्ताव है। धर्म आधारित नागरिकता के प्रावधान को लेकर लोग सड़कों पर हैं।