Tuesday , September 25 2018

10वीं क्लास की लड़की अर्वा इम्तियाज भट्ट कोच नहीं है, लेकिन किसी कोच से कम भी नहीं है

दसवीं क्लास की लड़की अर्वा इम्तियाज भट्ट दिव्यांगों के लिए बनी जम्मू-कश्मीर स्पोर्ट्स एसोसिएशन से जुड़े सभी 250 खिलाड़ियों के लिए वो आवाज है, जिन्होंने रोजाना साइन लैंग्वेज के जरिए इन खिलाड़ियों की खेल के बारे में अहम जानकारी देती है। आपको बता दें कि अर्वा इम्तियाज किसी टीम के कोच नहीं हैं, लेकिन ये किसी कोच से कम भी नहीं है। क्योंकि वो सन्नाटे को अपनी आवाज देकर उन खिलाड़ियों तक पहुंचाने का काम कर रही है, जो बोल और सुन नहीं पाते।

 

इतना ही नहीं 16 साल की अर्वा अपनी पढ़ाई छोड़कर कई बार टीम के साथ टूर्नामेंट के लिए शहर से बाहर जाती है। ये अलग बात है कि इससे उनका परिवार परेशान होता है। मगर इस लड़की में मदद का ऐसा जज्बा है कि अपनी सुरक्षा की परवाह किए बगैर ये इन खिलाड़ियों की आवाज बनी हुई है।

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इस काम के लिए अर्वा को पैसे नहीं मिलते हैं। मगर उसको इसकी परवाह नहीं, उसकी नजर में तो टीम की जीत ही उसके लिए सबसे बड़ा ईनाम है। पिछले साल दिसंबर में जम्मू-कश्मीर की टीम ने दिव्यांगों के लिए लिए रांची में हुए नेशनल गेम्स में चार गोल्ड, तीन सिल्वर और दो ब्रॉन्ज मेडल जीते थे।

अर्वा की मां रेहाना भी बोल नहीं सकती हैं, वहीं उनके भाई मोहम्मद सलीम, जोकि एक अच्छे बैडमिंटन खिलाड़ी हैं, वो भी न बोल सकते हैं और न ही सुन। अर्वा ने जब से होश संभाला, तब से वो अपनी मां और भाई को इस परेशानी से लड़ते हुए ही देख रही हैं। परिवार के साथ ही रिश्तेदारों ने भी उनके साथ पक्षपात किया। मां और भाई के साथ हो रही अन्याय के बाद अर्वा ने उनकी मदद का फैसला किया, जिसमें उन्हें अपने चाचा का साथ मिला, जो दिल्ली से साइन लैंग्वेज सीखकर आए थे। अर्वा ने अपने चाचा से ये सीखा और फिर जुट गई अपने मिशन में।

अर्वा के लिए यहां तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। खासतौर पर दिव्यांग बच्चों के माता-पिता को ये समझाना कि वो अपने बच्चों को घर से बाहर निकालें। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब जम्मू-कश्मीर की टीम को नेशनल गेम्स में शामिल होने के लिए रांची जाना था, तब दिव्यांग बच्चों के मां-बाप ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया। ऐसे में अर्वा ने बच्चों के मां-बाप को ये भरोसा दिलाया कि वो रांची में सुरक्षित रहेंगे। कई बार अर्वा को बच्चों के परिवार वालों से लड़ना पड़ता है।

वहीँ जम्मू-कश्मीर स्पोर्ट्स काउंसिल के सचिव वाहिद रहमद भी अर्वा को दूसरों के लिए प्रेरणा मानते हैं। वाहिद रहमत का कहना है, मैं 16 साल की लड़की का समर्पण देखकर हैरान हूं। ऐसे में जब भी दिव्यांग टीम बाहर खेलने जाती है और उनके साथ अगर अर्वा जा रही होती है, तो मैं कागजी कार्रवाई जल्दी पूरी करवाता हूं।

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