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1991 में चंद्रशेखर की सरकार नहीं गिरती तो राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद का समाधान निकल गया होता- शरद पवार

नई दिल्ली। एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने दावा किया है कि बाबरी मस्जिद और राम मंदिर विवाद सुलझाने के करीब था। उन्होंने कहा है कि अगर साल 1991 में प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार नहीं गिरती तो ये संभव था कि राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद का समाधान निकल गया होता।

एक मराठी न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में शरद पवार ने ये बात कही है। उन्होंने आगे कहा कि जिस वक्त ये विवाद चल रहा था, हम सभी इसी के समाधान में लगे थे और ये मुमकिन था कि अगर सरकार नहीं गिरती तो इस विवाद को उसी समय सुलझा लिया जाता।

लेकिन उसी दौरान 7 महीने पुरानी चंद्रशेखर सरकार से कांग्रेस ने मार्च, 1991 में समर्थन वापस ले लिया था। आपको बता दें कि चंद्रेशखर जी ने वीपी सिंह की सरकार गिरने के बाद कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई थी और आपसी मतभेदों के बाद ये सरकार 7 महीने ही चल पाई थी।

इसके साथ ही राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को सुलझाने की सभी कोशिशें अधूरी रह गई थी। इंटरव्यू में शरद पवार ने कहा कि नवंबर, 1990 में जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इस विवाद को सुलझाने की दिशा में जोरशोर से काम शुरू कर दिया था।

सरकार ने इस दिशा में शरद पवार और राजस्‍थान के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री भैरों सिंह शेखावत को मिलाकर एक अनौपचारिक कमेटी का गठन किया था।

शरद पवार ने कहा कि मुझे सरकार की तरफ से मिले आदेश के बाद राम जन्‍मभूमि न्‍यास के प्रतिनिधियों से बातचीत करनी और शेखावत जी को बाबरी मस्जिद एक्‍शन कमेटी के प्रतिनिधियों से बात करनी थी। इन बातों जा जिक्र शरद पवार ने अपनी आत्‍मकथा ”On My Terms:From the Grassroots to the corridors of Power” में भी किया है।

शरद पवार ने कहा वे लोग इस फॉर्मूले पर पहुंच रहे थे कि विवादित स्‍थल पर मेमोरियल बनाया जाए, और मंदिर एवं मस्जिद निर्माण के लिए जमीन आवंटित कर दी जाए। इसके तहत विवादित स्‍थल को छोड़कर 60-65 प्रतिशत जमीन पर मंदिर और बाकी 35-40 प्रतिशत पर मस्जिद के निर्माण का फॉर्मूला दिया गया।

पवार ने कहा कि सैद्धांतिक रूप से दोनों पक्ष इससे सहमत थे लेकिन इससे पहले की बात आगे बढ़ती, उसी बीच कांग्रेस ने चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस खींच लिया। बाद में सरकार गिरने के साथ ही बातचीत भी खत्‍म हो गई।

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