8% भारतीय डिप्रेशन के शिकार, 3.1 करोड़ लोगों पर सिर्फ एक हॉस्पिटल

8% भारतीय डिप्रेशन के शिकार, 3.1 करोड़ लोगों पर सिर्फ एक हॉस्पिटल

नई दिल्ली : भारत में डिप्रेशन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक़ फ़िलहाल 18 फ़ीसदी भारतीय डिप्रेशन के शिकार हैं. जो डब्ल्यूएचओ के दक्षिण पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में सबसे अधिक है. संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी के नवीनतम आकलन से पता चलता है कि चीन और भारत दुनिया भर में अवसाद के साथ रहने वाले कुल 322 मिलियन लोगों के लगभग 50% के लिए सबसे खराब प्रभावित देश हैं.

15 से 20 हज़ार मनोचिकित्सकों की ज़रूरत

दिल्ली स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ़ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज़ (इब्हास) के निदेशक डॉक्टर निमीश देसाई के अनुसार अमरीका में जहां 60-70 हज़ार मनोचिकित्सक हैं वहीं भारत में ये संख्या चार हज़ार से भी कम है. यहाँ इस वक़्त 15 से 20 हज़ार मनोचिकित्सकों की ज़रूरत है.

देश में फ़िलहाल 43 मेंटल अस्पताल

देश में फ़िलहाल 43 मेंटल अस्पताल हैं. डॉक्टर निमीश देसाई के अनुसार इन मेंटल अस्पतालों में से दो या तीन सुविधाओं के स्तर पर बेहतर माने जाते हैं, 10-12 में सुधार हो रहा है जबकि 10-15 अभी भी कस्टोडियल मेंटल हॉस्पिटल बने हुए हैं.

अवसाद के अलावा, भारत और अन्य मध्यम आय वाले देशों में आत्महत्याओं के लिए चिंता का एक बड़ा कारण भारत और चीन दोनों में बहुत अधिक प्रचलित है। 2015 में भारत में 3.8 करोड़ लोग 3% की व्यापकता दर के साथ चिंता विकारों से पीड़ित थे। आंकड़ों से पता चलता है कि 78% वैश्विक आत्महत्याएँ निम्न और मध्यम आय वाले देशों में हुईं, जबकि आत्महत्या का कारण दुनिया भर में होने वाली सभी मौतों का 1.5% था, जो 2015 में मृत्यु के शीर्ष 20 प्रमुख कारणों में शामिल है।

वैश्विक स्तर पर हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है

2014 में प्रकाशित डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में आत्महत्याओं की दुनिया में सबसे अधिक अनुमानित संख्या थी, जिसमें पाया गया कि वैश्विक स्तर पर हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है। अवसाद और चिंता दोनों ही पुरुषों की तुलना में महिलाओं में कहीं अधिक सामान्य पाए गए।

दुनिया भर में 30 करोड़ से अधिक लोग अवसाद से पीड़ित

आप यह जानकर चौंक जाएंगे कि दुनिया भर में 30 करोड़ से अधिक लोग अवसाद से पीड़ित हैं। उम्र के बाद से अवसाद और खराब मानसिक स्वास्थ्य को एक गंभीर मुद्दे के रूप में नजरअंदाज कर दिया गया है। लेकिन, क्या आप जानते हैं, अवसाद सबसे बुरी स्थिति में मृत्यु का कारण बन सकता है?

औसत आत्महत्या की दर प्रति लाख लोगों पर 10.9

भारत में औसत आत्महत्या की दर प्रति लाख लोगों पर 10.9 है और आत्महत्या करने वाले अधिकांश लोग 44 वर्ष से कम उम्र के हैं। जब देशों की बात आती है, तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत दुनिया का सबसे अवसाद वाला देश है, जिसके बाद चीन और अमेरिका हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार भारत, चीन और अमेरिका चिंता, सिज़ोफ्रेनिया और द्विध्रुवी विकार से सबसे अधिक प्रभावित देश हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन का कहना है कि कुछ आँकड़े कहते हैं 40 में से एक व्यक्ति या 20 में से एक व्यक्ति कभी न कभी डिप्रेशन का शिकार रहा है या अभी डिप्रेशन में है. वो बताते हैं कि इससे पहले 1987 में क़ानून लाया गया था लेकिन बाद में देखा गया कि उसकी प्रासंगिकता ख़त्म हो गई और वो अमानवीय था.

डॉक्टर हर्षवर्धन ने बताया कि सरकार मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 लाया, जिसमें कई प्रावधान किए गए. इनमें से एक आत्महत्या को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालना भी है.

उनका कहना था “मेंटल हेल्थ सेवाओं को ज़मीनी स्तर पर ले जाया गया है. पूरे भारत में 650 ज़िलों में स्थित प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों में सपोर्ट सिस्टम बनाए गए हैं जिसके तहत सभी प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों में एक मनोचिकित्सक विशेषज्ञ के साथ एक सोशल वर्कर, मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञ और आयुष्मान भारत के तहत आने वाले डेढ़ लाख हेल्थ और वेलनेस सेंटर में भी मेंटल हेल्थ पर फोकस किया गया.”

हालांकि उन्होंने इस बात को माना कि जितनी गंभीर ये समस्या है उसके मुताबिक भारत में मनोचिकित्सकों का संख्या कम है और इस दिशा में काम हो रहा है.

हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कुछ मेंटल संस्थानों में कस्टोडियल कमरों की बात से इनकार करते हुए कहा , ”मेंटल हेल्थ संस्थानों, मेडिकल कॉलेज, साइक्रेटिक विभागों की बुनियादी सुविधाएं बढ़ाने और उन्हें विकसित करने के लिए पूरा सपोर्ट किया जा रहा है और मनोचिकित्सों की संख्या भी बढ़ाई जाएगी.”

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