सीरिया की 80% आबादी सुन्नियों का है जबकि असद शिया हैं जिसकी आबादी 20% है, फसाद का जड़ यही है!

सीरिया की 80% आबादी सुन्नियों का है जबकि असद शिया हैं जिसकी आबादी 20% है, फसाद का जड़ यही है!

दमिश्क : सिरिया के 80 फीसद सुन्नी मुसलमानों पर 10 से 20 प्रतिशत शिया मुसलमान हावी हैं यहां तक की उच्च अधिकारी ज़्यादातर शिया ही हैं. दुसरी तरफ विद्रोहियों में सुन्नियों की तादाद सबसे ज़्यादा है. और यही वजह है कि असद के ख़िलाफ़ बगावत की एक वजह सुन्नी बहुसंख्य अबादी देश में शिया शासक होना है. जो विद्रोही सेना में शामिल सुन्नीयों को तुर्की, सऊदी अरब, अमरीका और यूरोपीय यूनियन समेत कई देशों से समर्थन है जबिक बशर अल-असद की शासन को ईरान का समर्थन है चुंकि ईरान शिया बहुल देश है और सिरिया में अपनी पकड़ मजबुत बनना चाहता है लेबनान में हिजबुल्लाह विद्रोही ग्रुप भी बशर अल-असद का समर्थन करता रहा है. चुंकि हिज्बुल्लाह भी शिया लड़ाकों का ही संगठन है. ईरान, इराक़, लेबनान और सीरिया में शिया सत्ता का बोलबाला है जबिक शिया की अबादी इन देशों में कम है. वहीं सुन्नी देश क़तर, यूएई, सऊदी का गुट मध्य पूर्व में अलग है. सीरिया में शिया-सुन्नी के साथ तेल गैस के टकराव के कारण भी विद्रोह है.”

मध्य पूर्व और मुस्लिम देशों के संघर्षों के पुनरुत्थान को बढ़ावा देने में एक प्राचीन धार्मिक विभाजन ही है सुन्नी और शिया बलों के बीच संघर्ष ने सीरिया के गृह युद्ध में ईंधन का काम किया है जो मध्य पूर्व के नक्शे को बदलने की धमकी दे रहा है, जो इराक में खत्म होने वाली हिंसा को प्रेरित करता है, और यह तनाव खाड़ी देशों में फैलता है जा रहा है। बढ़ते सांप्रदायिक संघर्ष ने भी पारम्परिक जिहादी नेटवर्क का पुनरुद्धार किया है जो इस क्षेत्र से परे एक खतरा बन गया है।

इस्लाम को सुन्नी सऊदी अरब और शिया ईरान के नेतृत्व के लिए प्रतिस्पर्धा करने वाले दो देशों ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने के लिए सांप्रदायिक विभाजन का इस्तेमाल किया है इसे इन्कार नहीं किया जा सकता है। उनकी प्रतिद्वंद्विता का निपटान सुन्नियों और शियाओं के भविष्य के बीच राजनीतिक संतुलन, विशेष रूप से सीरिया, इराक, लेबनान, बहरीन और यमन में होने की संभावना है।

आज पूरे क्षेत्र में हजारों संगठित सांप्रदायिक आतंकवादी हैं जो एक व्यापक संघर्ष को ट्रिगर करने में सक्षम हैं। और कई सुन्नी और शिया मौलवियों के प्रयासों के बावजूद बातचीत और प्रतिद्वंद्विता उपायों के माध्यम से तनाव को कम करने के लिए कई विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की है कि इस्लाम के विभाजन में बढ़ती हिंसा और अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए बढ़ते खतरे का कारण होगा।

सद्दाम हुसैन के मारे जाने के बाद इराक में शियाओं का वर्चस्व रहा है. जबिक सिरिया में सद्दाम के मारे जाने के बाद से ईरान वहां अपना प्रभाव बढ़ाया है.” सुन्नी प्रभुत्व वाला सऊदी अरब इस्लाम का जन्मस्थली है और इस्लामिक दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जगहों में शामिल है. जो दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों और धनी देशों में से एक है.

सऊदी अरब को ईरान से डर है ये तो तय है चुंकि मध्य-पूर्व वह जबरदस्त तरीके से हावी होना चाहता है और इसीलिए वह शिया नेतृत्व में बढ़ती भागीदारी और प्रभाव वाले क्षेत्र की शक्ति का विरोध करता है.

मुस्लिम आबादी में बहुसंख्यक सुन्नी हैं और अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, इनकी संख्या 85 से 90 प्रतिशत के बीच है. शिया सुन्नी सदियों से एक साथ रहते आए हैं और उनके अधिकांश धार्मिक आस्थाएं और रीति रिवाज एक जैसे हैं. इराक़ के शहरी इलाक़ों में हाल तक सुन्नी और शियाओं के बीच शादी आम थीं. कई देशों में यह दो संप्रदायों के सदस्यों के लिए एक समान मस्जिदों में विवाह करने और प्रार्थना करने के लिए आम हो गया है। वे कुरान और पैगंबर मोहम्मद (सल.) के वचनों में विश्वास करते हैं और इसी तरह प्रार्थना करते हैं, हालांकि वे इस्लामी कानूनों की व्याख्याओं और व्याख्याओं में भिन्न हैं।

शिया सुन्नी में अंतर है तो सिर्फ सिद्धांत, परम्परा, क़ानून, धर्मशास्त्र और धार्मिक संगठन का. उनके नेताओं में भी प्रतिद्वंद्विता देखने को मिलती है. शियाओं की अपेक्षा, सुन्नी धार्मिक शिक्षक और नेता ऐतिहासिक रूप से सरकारी नियंत्रण में रहे हैं. शुरुआती इस्लामी इतिहास में शिया एक राजनीतिक समूह के रूप में थे- ‘शियत अली’ यानी अली की पार्टी. शियाओं का दावा है कि मुसलमानों का नेतृत्व करने का अधिकार हजरत अली और उनके वंशजों का ही है. जो पैग़ंबर मोहम्मद (सल.) के दामाद थे.

Source: Pew Research, The Future of the Global Muslim Population, 2011
एक अनुमान के अनुसार, शियाओं की संख्या मुस्लिम आबादी की 10 प्रतिशत यानी 12 करोड़ से 17 करोड़ के बीच है. ईरान, इराक़, बहरीन, अज़रबैजान और कुछ आंकड़ों के अनुसार यमन में शियाओं का बहुमत है.

इसके अलावा, अफ़ग़ानिस्तान, भारत, कुवैत, लेबनान, पाकिस्तान, क़तर, सीरिया, तुर्की, सउदी अरब और यूनाइडेट अरब ऑफ़ अमीरात में भी इनकी अच्छी ख़ासी संख्या है.

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