Wednesday , September 26 2018

अभिसार शर्मा ने इशारों में रोहित सरदाना को बताया दंगाई पत्रकार

नई दिल्ली: एबीपी न्यूज़ के वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा ने अपने एक लेख में बिना किसी का नाम लिए आजतक के एंकर रोहित सरदाना पर निशाना साधा है। अभिसार ने इशारों इशारों में उन्हें दंगाई पत्रकार बताया है। उन्होंने लेख में लिखा है कि क्या ये बताने की जरूरत है कि कासगंज मे किस दंगाई पत्रकार ने गलत बयानी और झूठ अपने शो मे प्रसारित किया था और उसके झूठ से खुद उसकी संस्था इतनी परेशान हो गई कि उन्हे मामले को संभालने के लिए एक अदद पत्रकार को जमीन पर भेजना पड़ा?

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उन्होंने आगे लिख कि क्या ये बताने की जरूरत है कि देश मे फर्जी न्यूज़ यानि फेक न्यूज़ का सबसे ज्यादा फायदा किसको हुआ है? उनहोंने लिखा कि “मकसद यह था कि कासगंज के सहारे ऐसा दोहराव पैदा हो, ऐसा ध्रुविकरण पैदा हो जिससे वोटर खुद हिंदू मुसलमान के आधार पर बंट जाए और क्या ये बताने की जरूरत है कि इसका फायदा सिर्फ और सिर्फ भाजपा को होता है?

उनहोंने लिखा कि दंगा हो सो हो, तनाव हो सो हो, भाड़ मे जाए देश का सुख चैन। क्या मेरी ये चिंता बेमानी है? बताईये न बिहार मे क्या हो रहा है? कैसे नियम कानून की धज्जियां उड़ा कर यात्राएं निकाली गईँ, माहौल को भड़काया गया और नतीजा आपके सामने है।

वो बिहार जिसमे साम्प्रदायिक दंगे न के बराबर होते थे। वहां मानो झड़ी से लग गई और क्या ये कहना गलत होगा कि भाजपा का प्रौपगैंडा वार या जंग जो वो इन पत्रकारों और फर्जी भड़काऊ वेबसाईट्स के जरिए करती है। उसका असर सीधा सियासी तौर पर वोट के बंट जाने के तौर पर सामने आता है।

उनहोंने स्मृति पर भी निशाना साधते हुए लिखा कि स्मृतिजी भी यही हरकत चुनावी साल मे ही कर रही थीं। मकसद साफ है कि जो झुका नहीं है उसे बरगलाओ। एक शिकायत के आधार पर आपकी मान्यता 15 दिन तक लटक जाए। बाद मे एनबीए और प्रेस काउंसिल फैसला करती रहेगी। सवाल ये नहीं कि फैसला तो पत्रकारों की ईकाई को करना है। सवाल ये है कि आप संदेश क्या देना चाह रहे हैं और इन हरकतों से सत्ता के खिलाफ रिपोर्ट करने वाले कठिन सवाल करने वालों पर इसका क्या असर पड़ेगा।

उनहोंने लिखा कि क्या ये बताने की जरूरत है कि मौजूदा सरकार मे पत्रकार को किन किन दबावों से गुज़रना पड़ रहा है। कैसे कैसे फोन काल्स आते हैं? आपके एक एक शब्द एक एक बोली पर निगाह है। अगर ये सब न हो रहा होता तो स्मृतिजी की पहल पर विश्वास किया जा सकता था। क्या ये फरमान उस पत्रकार के लिए लिया था जो टीवी पर दंगा भड़काने का काम करता है? नहीं! क्या ये फरमान उन फर्जी दंगा भड़काऊ ऐजेंसियों के लिए है जो कथित तौर पर बीजेपी और सहयोग संस्थाओं की मदद से चल रही है? जिन्हे उनके नेता खुले आम समर्थन करते हैं ? नहीं!

मुद्दा नीयत का है और आपकी नीयत साफ नहीं है। लिहाज़ा आपके हर कदम पर शक पैदा होता है। इस अविश्वास की खाई को पाटने का गम्भीर प्रयास कीजिए, जो आपके चाटुकार हैं, वो आपके सत्ता से बाहर होने के बाद आपका साथ छोड़ देंगे। आप जब विपक्ष मे थे, तब ये चाटुकार कहां थे पत्रकारिता के मानचित्र पर बोलिए। पत्रकार विपक्ष होता है, और मै आज भी विपक्ष मे हूं और उस वक्त भी जब आप विपक्ष मे थे, और तब भी जब आप सत्ता से बाहर होंगे।

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