एक अफगान शरणार्थी का तोहफा : शतरंज बोर्ड के साथ जलालाबाद से दिल्ली के पालिका बाज़ार तक

एक अफगान शरणार्थी का तोहफा : शतरंज बोर्ड के साथ जलालाबाद से दिल्ली के पालिका बाज़ार तक

58 वर्षीय अब्दुल समद अफगानिस्तान में जलालाबाद से दिल्ली के पालिका बाज़ार तक एक लंबा सफर तय करते हैं। वो अपने साथ शतरंज खेलने का बोर्ड लेकर आये हैं। अब लगभग 11 बजकर हर दिन समद को तीन बोर्ड को पालिका के भूमिगत बाजार के मुख्य द्वार के बाहर टेबल पर उन्हें व्यवस्थित करते हैं। यहां से शतरंज खेलने वाले जल्द ही सभी तीन बोर्डों पर कब्जा कर लेते हैं और शुरू होती हैं इसकी चालें।

दिसंबर 2014 में समद भारत पहुंचे तब से वह दिल्ली में मालवीय नगर के पार्क या जामा मस्जिद से सेंट्रल पार्क और पालिका बाज़ार में शतरंज खेल रहे हैं। यहां किसी को भी दोस्ताना गेम के लिए स्वागत है, लेकिन जो इसको पैसे के लिए खेलना चाहता है, उन्हें मनाही है। दिन भर में लगभग 50 लोग इस खेल में अपना हाथ आजमाते हैं। नांगलोई से एक विज्ञापन डिजाइनर अमित भारद्वाज सप्ताह में दो बार यहां आकर खेलते हैं।

वे कहते हैं कि मज़ा बहुत आता है इनके साथ; घंटे बीत जाते हैं और पता ही नहीं चलता। लोग उनको शतरंज का चाचा भी पुकारते हैं। बॉलीवुड के प्रशंसक, समद को ‘बहारों फूल बरसाओ’ और ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ जैसे पुराने हिट गाने सुनना पसंद है। उनका दावा है कि उन्होंने अफगानिस्तान की एक जेल में 1985 से 88 तक तीन साल बिताए थे, जहां उन्होंने जेलर के साथ शतरंज खेली थी।

उन्होंने कहा कि 1988 में वह पाकिस्तान के कुछ परिवार के सदस्यों के साथ भाग आये और 2014 में भारत आ गए। समद का कहना है कि उनके बेटे अब भी अफगानिस्तान में हैं, जबकि उनकी बेटियां, बहनें और मां अब अमेरिका में हैं। उन्हें जल्द ही देखने की उम्मीद है, और उन्होंने एक कनाडाई वीजा के लिए आवेदन किया है। जलालाबाद के लिए वह कहते हैं कि वापस लौटना असंभव है।

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