तो इलाहाबाद को अकबर ने बसाया, प्रयागराज का नाम नहीं बदला गया?

तो इलाहाबाद को अकबर ने बसाया, प्रयागराज का नाम नहीं बदला गया?
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उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद शहर का नाम बदलकर प्रयागराज रखने का फैसला किया है. लेकिन क्या इलाहाबाद ही प्रयागराज था या फिर ये दोनों अलग अलग शहर थे, जानिए.

सरकार का कहना है कि इस बारे में उसे साधु-संतों, अखाड़ा परिषद और कुछ प्रबुद्ध लोगों की ओर से प्रस्ताव आए थे. दो दिन पहले मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने इलाहाबाद में इसकी घोषणा की थी और मंगलवार को राज्य कैबिनेट ने इसकी मंजूरी दे दी.

लेकिन सरकार के इस फैसले की राजनीतिक दलों में आलोचना हो रही है. आलोचक कहते हैं कि कि सरकार के काम-काज से लोगों का ध्यान हटाने के लिए ऐसा हो रहा है. कई बुद्धिजीवी भी इसे बेतुका फैसला बता रहे हैं. लेकिन तमाम हिन्दू संगठन सरकार के इस प्रयास के समर्थन में भी खड़े हैं और सरकार की वाहवाही कर रहे हैं.

दरअसल, इलाहाबाद उत्तर प्रदेश का एक ऐसा शहर है जिसकी ऐतिहासिक दृष्टि से हर काल-खंड में राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में एक अलग पहचान रही है. प्राचीन काल में यह शहर प्रयाग नाम से जाना जाता था लेकिन साल 1583 के बाद से इसकी पहचान इलाहाबाद के रूप में हो गई.

जानकारों के मुताबिक प्राचीन ग्रंथों में इस शहर का नाम प्रयाग या फिर प्रयागराज ही आता है. पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक ब्रह्मा ने सबसे पहले यहीं पर यज्ञ किया था, इसीलिए इस भूमि का नाम प्रयाग पड़ा. रामचरित मानस में भी इसे प्रयागराज ही कहा गया है जबकि यह ग्रंथ सोलहवीं शताब्दी का है.

अकबरनामा और अन्य मुगलकालीन ऐतिहासिक पुस्तकों से पता चलता है कि अकबर ने साल 1574 के आसपास प्रयागराज में किले की नींव रखी और एक नया शहर बसाया जिसे इलाहाबाद नाम दिया गया. 1583 में इस शहर का नाम अकबर द्वारा चलाए गए संप्रदाय दीन-ए-इलाही के नाम पर रखा गया.

हालांकि इस दौरान भी और आज भी यहां संगम तट के आस-पास के इलाके को प्रयाग ही कहा जाता रहा है और हर साल लगने वाले माघ मेला या फिर छह वर्ष और 12 वर्ष के अंतराल पर लगने वाले अर्धकुंभ और कुंभ मेले के दौरान बसने वाले तंबुओं के शहर को प्रयागराज मेला क्षेत्र ही कहा जाता रहा है. शहर के पास स्थित एक प्रमुख रेलवे स्टेशन का नाम भी प्रयाग स्टेशन है.

आजादी के बाद भी यहां की न सिर्फ राजनीतिक हैसियत अहम रही है बल्कि साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में भी यह शहर अग्रणी रहा है. धार्मिक पहचान तो विशिष्ट रही ही है.

लेकिन इस शहर का नाम बदलने की कोशिशों के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आज जो इलाहाबाद शहर है क्या वही शहर प्रयाग रहा है या फिर दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे से अलग रहा है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर हेरंब चतुर्वेदी कहते हैं कि आज जो इलाहाबाद है, वो प्रयाग नहीं है, बल्कि दोनों अलग-अलग हैं.

साभार- ‘डी डब्लू हिन्दी’

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