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पहचान खोती चांदी का वर्क बनाने की कला, गिरावट की एक वजह गाय भी है

मशीनें जीवन के हर क्षेत्र में इंसानों की जगह ले रही हैं और अब इसके चलते हथौड़ों की चोट पर लजीज मिठाइयों के लिए चांदी का वर्क तैयार करने की कला अपनी पहचान खो रही है।

एक समय था जब चारमीनार-शाह अली बंडा क्षेत्र में चांदी का वर्क तैयार करने वाली कई दुकानें थीं जहां पुरुषों के समूह को प्लास्टिक की चादरें पीटते देखा जा सकता था जिसमें एक तालबद्ध टोंग-टोंग की आवाज आती थी।

चांदी का वर्क चांदी के छोटे टुकड़ों से बनता है जिसको प्लास्टिक की शीट से बनाकर किताब में जब तक रखा जाता है तब तक टिन पन्नी के आकार को नहीं लेता है। कागज का उपयोग करते हुए चांदी के फ़ॉइल को हटा दिया जाता है और बाजार में व्यापारियों को बेच दिया जाता है।

तेलंगाना टुडे में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक कुछ दशक पहले तक शहर में इसकी लगभग 50 छोटी इकाइयां थीं जो अब घटकर करीब 10 दुकानें हैं। शाकाहारी और मांसाहारी के कारण उद्योग नीचे गिर गया है और मैनुअल की जगह मशीन उत्पाद को बहुत सस्ता बना देती है।

व्यापार के घटते रहने का एक अन्य कारण ‘अफवाहें’ भी हैं जिसमें कहा जाता है कि चांदी का वर्क तैयार करने के लिए गाय की त्वचा का प्रयोग किया जाता है। हालांकि, चारमीनार में यूटीसी वर्क दुकान के एक कार्यकर्ता मोहम्मद अकबर ने इस दावे का खंडन किया।

इसके फ़ॉइल्स तीन किस्मों, एल्यूमीनियम, चांदी और सोने में बने होते हैं। एल्यूमिनियम वर्क रेशम के कपड़े, फल और मांस आदि पर लगाया जाता है, जबकि मिठाई को सजाने के लिए चांदी और दवाओं को लपेटने के लिए हकीम द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। सोने का वर्क जो सबसे महँगा है, वह केवल ऑर्डर पर तैयार होता है।

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