हर एक मजदूर की मौत सरकार की नाकामी बयान करती है

हर एक मजदूर की मौत सरकार की नाकामी बयान करती है

“कोरोना महामारी से लगभग सभी देश जूझ रहे हैंI इस लिस्ट में वो तमाम देश भी शामिल हैं जो खुद को सुपर पावर होने का दम भरते रहे हैंI चाहे वह चीन, अमेरिका, इटली, ब्रिटेन, फ्रांस हो या अपना देश भारत ही क्यों न हो! आज यह बात किसी से छुपी नहीं है की भारत में मज़दूरों के साथ किस तरह का बर्ताव किया जा रहा हैI यदि इसे ‘उत्पीड़न’ कहा जाये तो यह कहना गलत नहीं होगाI”

हर एक मजदूर की मौत सरकार की नाकामी बयान करती है 1

आजकल ‘मजदूर’ शब्द सुनते ही दिमाग में पैदल चलते, कंधे में सामान टांगे, चिलचिलाती धूप में अपने घरों की तरफ सरपट बढ़ते मज़दूर दिखाई पड़ते हैंI पैरो में चप्पल नहीं है, खाने को खाना नहीं है, घर पहुंचने के लिए कोई सरकारी सुविधा नहीं है जिस वजह से उन्हें अपने घर तक का रास्ता खुद ही पैदल चल कर तय करना पड़ रहा हैI

कोरोना महामारी से लगभग सभी देश जूझ रहे हैंI इस लिस्ट में वो तमाम देश भी शामिल हैं जो खुद को सुपर पावर होने का दम भरते रहे हैंI चाहे वह चीन, अमेरिका, इटली, ब्रिटेन, फ्रांस हो या अपना देश भारत ही क्यों न हो! आज यह बात किसी से छुपी नहीं है की भारत में मज़दूरों के साथ किस तरह का बर्ताव किया जा रहा हैI यदि इसे ‘उत्पीड़न’ कहा जाये तो यह कहना गलत नहीं होगाI

24 मार्च, वह तारीख जब रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की, तब से ही मज़दूर होने का दर्द सबके सामने आ गयाI मोदी सरकार ने जब लॉकडाउन करने का विचार किया था, उसी समय उन्हें प्रवासी मज़दूरों के बारे में सोचना चाहिए थाI जो भारत में प्रवासी मज़दूर हैं, यदि लॉकडाउन के कारण तमाम काम बंद हो जायेंगे, तो उनकी रोजी रोटी छिन जाएगीI

ऐसे में जाहिर सी बात है कि लाखों मजदूर अपने गृहनगर की तरफ रुख करेंगेI इस बात का इल्म सरकार को अवश्य होना चाहिये था कि यदि ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है तो वे मजदूर अपने घरों तक कैसे पहुंचेगेI

लॉकडाउन के पहले हफ्ते में ही सरकारी व्यवस्था न होने की वजह से 28 मार्च को बड़ी तादाद में मज़दूर आनंद विहार बस स्टैंड पर इकठ्ठा हो गए थेI यही हाल चेन्नई, महाराष्ट्र, तेलंगाना सहित कई महानगरों में देखने को मिलाI

पहले, दूसरे, तीसरे और अब चौथे लॉकडाउन के दौरान कई ऐसे दृश्य अमूमन हम सभी की नज़रों से होकर गुज़रे हैं जो न केवल मन को भावुक करने बल्कि सरकार की नाकामियों के प्रति गुस्सा करने पर मजबूर कर गएI

लॉकडाउन की घोषणा के तीसरे ही दिन यानि 28 मार्च को किसी प्रकार का साधन उपलब्ध न होने के कारण पैदल दिल्ली से अपने गृहराज्य मध्यप्रदेश जाते हुए रणवीर सिंह नामक मजदूर ने आगरा हाईवे पर ही दम तोड़ दियाI

महाराष्ट्र से पैदल घर की तरफ बढ़े करीब 16 मजदूर थकान होने की वजह से पटरी पर ही आराम करने लगे और उनकी आंख लग गयी और वह ऐसा सोये के फिर कभी सुबह नहीं देख पाएI उत्तर प्रदेश के औरैया में ट्रक की टक्कर से 22 मजदूरों को अपनी जान गंवानी पड़ीI

यह घटनाएं उदाहरण हैं जो सरकार के निकम्मेपन का सालों तक ढिंढोरा पीटेंगीI ऐसे न जाने कितने रणवीर सिंह ने पैदल चल कर अपनी जान गंवाई है और दर्जनों सड़क दुर्घटनायें घर पहुंचने के सपने के साथ निकले मजदूरों को लील गयींI

जब मैं यह लेख लिख रहा हूँ तब भी कहीं न कहीं कोई न कोई मज़दूर सरकार की उदासीनता की वजह से जिंदगी और मौत के बीच अपने घर पहुंचने की जद्दोजहद कर रहें होंगेI

द वायर में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 25 मार्च से 14 मई तक तकरीबन 378 मज़दूर अपनी जान गँवा चुके है जिस मे पैदल चलने के कारण 29, भूख और पैसे की कमी की वजह से 58, पुलिस की मार से 12, स्वस्थ्य सेवाएं न मिल पाने की कारण 42, सड़क/रेल हादसे की वजह से करीब 89 मजदूर अपनी जान गंवा चुके हैंI

गौरतलब है कि यह वो आंकड़े है जो मीडिया के सामने आ पाईं हैं, ऐसे बहुत सी घटनाएं घटित हुई हैं जो मीडिया तक नहीं पहुंच पायींI इसमें कोई दो राय नहीं कि इन मजदूरों की मौत के लिए सीधे तौर पर केंद्र में बैठी मोदी सरकार और राज्य की सरकारें ज़िम्मेदार हैंI

जब मज़दूर भूखे-प्यासे लॉकडाउन से जूझ रहें हैं, निर्दयी महानगरों से निकल कर अपने घरों की तरफ बढ़ रहें हैंI इसी बीच सरकार ने श्रम कानून में फेरबदल करके मज़दूरों पर ज़बरदस्त हमला किया हैI श्रम कानून मजदूरों का वह हथियार था जो उन्हें सरकारी व गैरसरकारी संस्थानों के शोषण से बचाता थाI

इस कानून के तहत मज़दूरों के पास एक अधिकार रहता था जिसके अंतर्गत न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम 1948, औधोगिक विवाद अधिनियम 1947, ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926, बोनस भुगतान अधिनियम 1965 आदि शामिल है|

 

इन सभी कानून के तहत मजदूर अपनी सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा, स्वास्थ्य, समय पर भुगतान, हड़ताल, कार्य की समय सीमा जैसे तमाम मुद्दों पर अपना हक़ जताते थेI कोरोना काल के दौरान औंधे मुंह गिरी अर्थव्यवस्था को ऊपर उठाने का जिम्मा मजदूरों पर डालते हुए कई राज्य सरकारों ने इसे अपने सुविधा अनुसार ख़त्म कर दिया है|

 

संशोधित कानून के तहत मज़दूरों को दिन में 8 घंटे के बजाय अब 12 घंटे काम करना होगा और हफ्ते में कुल 48 घंटे की जगह 72 घंटे काम करना होगा| इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, पंजाब व उड़ीसा शामिल हैंI

 

अगर बात करें उत्तर प्रदेश की तो योगी जी की अनुवाई वाली बीजेपी सरकार ने श्रम कानून के तहत आने वाले 38 में से 35 कानून को तीन वर्ष के लिए ख़त्म कर दिया हैI इसमें न्यूनतम मज़दूरी, बोनस भुगतान, ट्रेड यूनियन जैसे अहम कानून शामिल हैI

 

वहीं मध्य प्रदेश में 1000 दिन के लिए औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, ट्रेड यूनियन से जुड़े कानून, इंस्पेक्टर द्वारा उद्योग की जाँच, सुविधा अनुसार मज़दूरों को काम पर रखना, उनकी छंटनी करना जैसे अहम कानून में बदलाव किया गया हैI

 

आम बोल चाल में कहें तो मज़दूरों के शरीर को खरीदने का प्रयास है ताकि उनसे मनमाफिक काम लिया जा सके, जिससे इन राजनीतिक पार्टियों के खजाने का ख्याल रखने वाले कारोबारी जगत के लोगों का ख़जाना भरा जा सकेI

 

राज्य सरकार द्वारा किये गए बदलाव के पीछे दलील दी जा रही है कि इससे उद्योग जगत में बढ़ोतरी होगी, मज़दूरों का विकास होगा और उन्हें रोज़गार मिलेगाI मगर यह दलील बिलकुल तर्कहीन और हास्यास्पद हैI सीधे तौर पर इससे मज़दूरों के प्रति शोषण बढ़ेगाI

 

लेखक: फैज़ान आलम

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