Wednesday , December 13 2017

भूख से लड़ने के लिए हम पाकिस्तान से काफी कुछ सीख सकते हैं

बीते रविवार को ‘मन की बात’ कार्यक्रम के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के लोगों से खाने की बर्बादी रोकने की अपील करते हुए कहा कि ‘हम प्लेट भर ले लेते हैं, फिर खा नहीं पाते और जूठन छोड़कर निकल जाते हैं। सोचिए, जूठन न छोड़ें, तो कितने लोगों का पेट भर सकता है?’ प्रधानमंत्री ने जिस गंभीरता से भोजन की बर्बादी का मुद्दा उठाया है, उससे यह उम्मीद बंधी है कि भारत में भी इस संबंध में, खासकर शादी व दूसरे समारोहों में खाने की बर्बादी को रोकने के लिए कानून बन जाएगा।

ऐसा कानून पाकिस्तान में कई साल से है; और वहां इसकी पहल सुप्रीम कोर्ट ने की थी। पाकिस्तान में इस कानून पर सख्ती से अमल भी हो रहा है। अब जरा हमारे यहां के हालात पर गौर कीजिए।

एक सर्वे के अनुसार, अकेले बेंगलुरु शहर में हर साल शादियों में 943 टन पका हुआ खाना बर्बाद होता है। इतने खाने से लगभग 2.6 करोड़ लोगों को एक समय का सामान्य भारतीय खाना खिलाया जा सकता है। दिल्ली में ऐसा कोई सर्वे तो नहीं हुआ है, पर यहां की शादियों में अन्न की बर्बादी बेंगलुरु से कहीं ज्यादा ही होगी।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल 23 करोड़ टन दाल, 12 करोड़ टन फल और 21 करोड़ टन सब्जियां वितरण प्रणाली की खामियों के चलते खराब हो जाती हैं, जबकि ‘वल्र्ड हंगर इंडेक्स’ में हमारा स्थान 67वां है।

यह बेहद शर्मनाक बात है कि भारत में हर चौथा व्यक्ति भूखे पेट सोने को मजबूर है। शादियों में फिजूलखर्ची व धन की बर्बादी के खिलाफ कानून बनाने का विचार यूपीए शासन में राष्ट्रीय सलाहकार समिति के सामने भी आया था। तत्कालीन खाद्य मंत्री के वी थॉमस ने 2011 में भोजन की बर्बादी को रोकने के इरादे से कानून बनाने की पहल की घोषणा की थी। शादियों में मेहमानों की संख्या नियंत्रित करने से लेकर कई अन्य बातें भी उस विधेयक में शामिल थीं। मगर मेहमानों की संख्या को कानूनी रूप से नियंत्रित करने के विरोध की आशंका को देखते हुए आगे बढ़ने से सरकार डर गई।

पिछले वर्ष कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन ने शादियों में खाने की बर्बादी को रोकने के साथ-साथ विवाह के पंजीकरण को कानूनन अनिवार्य बनाने वाला एक निजी विधेयक लोकसभा में पेश किया था। वह अभी संसदीय प्रक्रिया के हवाले है। हालांकि निजी विधेयकों के हश्र को देखते हुए इससे बहुत उम्मीद नहीं बंधती।

इसलिए सरकार को ही इस दिशा में ठोस पहल करनी होगी। इस संदर्भ में हम पाकिस्तान से काफी कुछ सीख सकते हैं। जनवरी-2015 में एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए वहां की शीर्ष अदालत ने शादी-विवाह में दिखावे को रोकने के आदेश दिए थे।

इसे फैसले को आधार बनाते हुए पहले पंजाब और फिर सिंध सूबे की असेंबलियों ने बाकायदा विधेयक पारित किए। पाकिस्तान में कानून है कि शादी या अन्य समारोहों में एक से ज्यादा मुख्य व्यंजन नहीं परोसा जा सकता। यह सुप्रीम कोर्ट ने बता दिया है कि एक करी, चावल, नान या रोटी, सलाद और दही या रायता से ज्यादा परोसना गैर-कानूनी है। विभिन्न राज्यों में पारित कानून में रात में दस बजे के बाद विवाह समारोह पर पाबंदी, घर के बाहर, पार्क या गली में बिजली के बल्बों की सजावट व आतिशबाजी के साथ-साथ दहेज की नुमाइश पर भी सख्त पाबंदी है।

इस कानून के उल्लघंन पर एक महीने की सजा और 50 हजार से दो लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। शुरुआत में वहां के जमींदार वर्ग ने इसका विरोध किया, कुछ लोग अदालत भी गए, मगर सुप्रीम कोर्ट ने कोई ढील देने से इनकार कर दिया। दूसरी तरफ, आम लोगों ने इस कानून का खुलकर स्वागत किया है। वहां प्रशासन ने इस कानून को लागू कराने का जिम्मा बारात घरों, बैंक्वेट हॉल, फार्म हाउस आदि पर डाल रखा है। यदि कहीं कानून टूटता पाया गया, तो इनके मालिकों पर पहले कार्रवाई होती है। पिछले साल एक केंद्रीय मंत्री भी इसकी चपेट में आ चुके हैं।

बहरहाल, भोजन की बर्बादी का रुकना न केवल हमारे देश के भूखे लोगों के लिए, बल्कि हमारे संसाधनों के लिए भी एक वरदान होगा। आखिर हम जितना अन्न बर्बाद करते हैं, उतना ही जल भी बर्बाद होता है, और उतनी ही जमीन की उर्वरा क्षमता भी प्रभावित होती है।

  • पंकज चतुर्वेदी
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