Tuesday , September 18 2018

असम में बंगाली मुसलमानों से ‘भेदभाव’ का आरोप, संयुक्त राष्ट्र ने चेताया

वेरिफ़िकेशन करने आई बॉर्डर पुलिस सीधे मेरी और मेरे बेटे की फ़ोटो मांगने लगी. पूछने पर कहा कि आपके मामले को फ़ॉरेनर्स ट्राइब्यूनल में भेजना है. पुलिस ने मेरी नागरिकता से जुड़े काग़ज़ातों के बारे में पूछा तक नहीं. मैंने जब उनसे नए दिशा निर्देशों के बारे मे पूछा तो उन्हें कोई जानकारी नहीं थी. बिना किसी तहक़ीक़ात के पुलिस सीधे घर आ जाती है. पिछले कुछ दिनों से हमें एनआरसी वेरिफ़िकेशन के नाम पर परेशान किया जा रहा है.”

यह कहना है साल 2009 में भारतीय वायुसेना से रिटायर हुए असम के सादुल्लाह अहमद का.

इन दिनों असम में एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिजेंस) यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को लेकर बंगाली मुसलमानों की तरफ़ से ऐसे ही आरोप सामने आ रहे हैं. वहीं वेरिफ़िकेशन प्रक्रिया से गुज़र रहे बंगाली हिंदू भी एनआरसी अपडेट को लेकर काफ़ी डरे हुए हैं.

सादुल्लाह अहमद का आरोप है कि कुछ लोग उनके बंगाली मुसलमान होने के कारण उन्हें इस तरह की परेशानी में डाल रहे हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा,”सिस्टम की ग़लती के कारण मेरी बड़ी बहन को गुवाहाटी हाई कोर्ट ने विदेशी घोषित कर दिया है, लेकिन अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है. हमारी कुछ ग़लतियों की वजह से बहन की नागरिकता से जुड़े पुराने काग़ज़ात अदालत में पेश नहीं कर सके. जबकि मेरे पिता का नाम साल 1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में है. मेरी बहन को विदेशी घोषित करने के बाद अब ये लोग मुझे भी फ़ॉरेनर्स ट्राइब्यूनल भेजना चाहते हैं.”

सादुल्लाह कहते हैं, “एनआरसी को लेकर पिछले कुछ दिनों से मेरा पूरा परिवार काफ़ी तनाव में है.गुवाहाटी केंद्रीय विद्यालय में पढ़ रहा मेरा छोटा बेटा अकसर इन बातों से परेशान होकर रोने लगता है. वो कहता है, पापा हम एयरफ़ोर्स में असम से बाहर ही ठीक थे.पुलिस जिस कदर बात करती है मानो मैं कोई घुसपैठिया हूं. अगर में भारतीय नागरिक नहीं होता तो क्या मुझे भारतीय वायुसेना में नौकरी मिलती? अभी मैं गुवाहाटी के एकाउंटेंट जनरल (आडिट) कार्यालय में एक वरिष्ठ अधिकारी की हैसियत से काम कर रहा हूं. मेरी नागरिकता की वेरिफ़िकेशन के बाद ही मुझे नौकरी मिली है.”

संयुक्त राष्ट्र की चिंता

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संस्था के लिए काम करने वाले इन व्यक्तियों के पत्र पर ऑल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ के अध्यक्ष अजीजुर रहमान कहते हैं, “असम में जिस कदर नियमों के ख़िलाफ़ जाकर सरकारी अफ़सर एनआरसी अपडेट का काम कर रहे हैं, उससे हमें संदेह है कि बंगाली मुसलमान और बंगाली हिंदू में भेदभाव हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संस्था के लोगों ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को भेजे पत्र में जो बातें लिखी हैं वो काफ़ी जायज़ हैं. हम इस विषय पर असम सरकार और भारत सरकार को पहले ही ज्ञापन सौंप चुके हैं.”

छात्र नेता रहमान ने कहा कि केंद्र सरकार को एनआरसी प्रक्रिया में इस तरह के मतभेद की जांच करवानी चाहिए क्योंकि सैकड़ों लोग इस तरह की परेशानियों का सामना कर रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने ग्राम पंचायत के प्रमाण पत्र दाखिल करने वाले लोगों का नाम वेरिफ़िकेशन करने के बाद एनआरसी में शामिल करने का निर्देश दिया था, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं किया गया. क़रीब 29 लाख लोगों ने ग्राम पंचायत प्रमाण पत्र दाखिल किया था, लेकिन आधे से ज़्यादा लोगों का नाम नहीं आया.”

इसके जवाब में प्रदेश बीजेपी के वरिष्ठ नेता तथा असम वित्त निगम के अध्यक्ष विजय गुप्ता कहते हैं, “असम सरकार की तरफ़ से किसी के साथ भेदभाव करने का सवाल ही नहीं उठता. लेकिन अगर कोई अवैध प्रवासी है तो उसका नाम एनआरसी में नहीं आएगा. इसके अलावा फ़ाइनल ड्राफ्ट प्रकाशित करने के बाद भी दावा और आपत्ति के तहत लोग आवेदन कर सकेंगे.”

“एनआरसी वेरिफ़िकेशन के नाम पर अगर किसी को परेशान किया जा रहा है तो उस अधिकारी की शिकायत करनी चाहिए. सरकार तुरंत कार्रवाई करेगी.”

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