बिहार दंगा: मदरसे पर हमले के दौरान डॉक्टर अशोक ने 70 मुस्लिम छात्रों की बचाई थी जान

बिहार दंगा: मदरसे पर हमले के दौरान डॉक्टर अशोक ने 70 मुस्लिम छात्रों की बचाई थी जान
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27 मार्च को बिहार में समस्तीपुर ज़िले के रोसड़ा में जब दंगाई मस्जिदों और मदरसे पर हमले कर रहे थे तब शहर के ही डॉक्टर अशोक मिश्रा मदरसे के बच्चों को को अपने घर में छुपा रहे थे. वो शहर के जाने-माने डॉक्टर हैं.

उनका घर और क्लिनिक मदरसे के बगल में है. 27 मार्च को दिन में करीब 12 बजे दंगाइयों ने मदरसे पर हमला बोला था. अशोक मिश्रा ने 20 बच्चों के साथ मदरसे के दो शिक्षकों को भी अपने यहां शरण दी थी. इनमें मदरसे के संचालक मौलाना नज़ीर अहमद नदवी भी शामिल थे. जब दंगाइयों ने मदरसे पर हमला किया तो अशोक मिश्रा मरीज़ों को देख रहे थे.

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तभी उनके किराएदार के एक परिवार की महिला ने कहा कि मदरसे पर दंगाइयों ने हमला कर दिया है और बच्चे घर के पीछे खड़े हैं. अशोक मिश्रा ने बिना देरी किए सारे बच्चों को अपने घर में छुपा लिया. अशोक मिश्रा पूरे वाकये के बारे में बताते हैं, ”मैंने उन बच्चों से कहा कि तुम लोग डरो मत हम सब तुम्हारे साथ हैं. उनके साथ दो टीचर भी थे.

सबसे कहा कि आप लोग बिल्कुल रिलैक्स रहिए. वो लोग भी मेरे कहने के मुताबिक़ मान गए. सभी बुरी तरह से डरे हुए थे. हमने बच्चों को आश्वस्त किया कि उन्हें कोई कुछ नहीं कर सकता है.” मिश्रा कहते हैं, ”माहौल ठीक हुआ तो मैंने कहा कि पुलिस जो पूछे बिल्कुल सच-सच बता देना. किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है.

मैंने बच्चों से कहा कि तुम लोग सही बात बताओगे तो सारी चीज़ें समझ में आएंगी. ऐसे आश्वस्त करना तो मेरा फ़र्ज था. मैं उनकी हर हाल में सुरक्षा करता. ये नहीं भी आते तब भी मैं उन्हें घर लाता.” क्या अशोक मिश्रा को दंगाइयों से डर नहीं लग रहा था? इस पर अशोक मिश्रा कहते हैं, ”डर क्यों लगेगा. मुझे इस मामले में डर नहीं लगता.

मनुष्यता के नाते मेरा फ़र्ज था और मैंने वही काम किया.” अशोक मिश्रा का कहना है कि रोसड़ा में ऐसा पहली बार हुआ है. मिश्रा कहते हैं, ”रोसड़ा शहर का माहौल कल तक तो ऐसा ही था को लोग एक दूसरे का चाचा और भैया कहते थे. हम तो ऐसे वातावरण में थे जहां धार्मिक सहिष्णुता कभी टूटी नहीं.” अशोक मिश्रा के क्लिनिक में एक कैलेंडर मेरा ध्यान बार-बार खींच रहा था. उस पर लिखा हुआ था- अयोध्या करती है आह्वान, ठाठ से हो राम मंदिर का निर्माण.

यह कैलेंडर सरस्वती शिशु विद्या मंदिर का था. मैंने इस कैंलेंडर के बारे में अशोक मिश्रा से पूछा कि क्या वो भी राम मंदिर का निर्माण चाहते हैं और उनके घर में यह कैलेंडर कैसे लगा? इस पर अशोक मिश्रा कहते हैं,

”सरस्वती विद्या मंदिर के प्रचारक आए थे और वो ही लगाकर चले गए. यहां और भी जैसे कैलेंडर लगे हुए हैं वैसे ही यह भी है. जहां तक अयोध्या में मंदिर बनाने की बात है तो जो मूर्ख व्यक्ति है वो ही इस तरह की मांग करेगा. ये उन्हीं की पुकार है. ज्ञानी आदमी जानता है कि धर्म को किस तरह विकृत किया गया.

मरणासन्न हालत में जब ब्लड दिया जाता है तो क्या मरीज़ पूछता है कि यह हिन्दू का ब्लड है या मुसलमान का.” अशोक मिश्रा रोसड़ा में 19 सालों से शहर के लोगों का इलाज कर रहे हैं. उनका कहना है कि नफ़रत की बीमारी का इलाज मनुष्यता के गुणों से ही हो सकता है. अशोक मिश्रा ने भागलपुर से 1974 में जीएमएस किया था. मदरसे के संचालक मौलाना नज़ीर अहमद नदवी कहते हैं कि शहर को अशोक मिश्रा जैसे लोगों की ज़्यादा ज़रूरत है ताकि आग लगने पर पानी लेकर सामने आने की हिम्मत रख सके.

नदवी से मैंने अशोक मिश्रा के घर का रास्ता पूछा तो वो बताने से डर रहे थे कि कहीं मिश्रा जी को दिक़्क़त न हो जाए. जब अशोक मिश्रा के घर पहुंचा तो उनके मन में कोई डर नहीं था कि दंगाई जान जाएंगे कि उन्होंने मुस्लिम बच्चों को बचाया था.

क्लिनिक के बाहर बैठे मरीज़ अशोक मिश्रा का इंतज़ार कर रहे थे. मैं बाहर निकला और वो मरीज़ों के दुख-दर्द सुनने लगे. साभार- BBC हिन्दी (हेडलाइन को छोड़कर इस रिपोर्ट में एक भी शब्द का नहीं किया गया बदलाव)

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