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बर्थ DaY: बिस्मिल और अशफाक की दोस्ती ने हिन्दुस्तानियों को सिखाया हिन्दू-मुस्लिम भाईचारा

भारत की आजादी की लड़ाई में जब पूरे देश में कांग्रेस के अहिंसात्मक आंदोलन की लहर दौड़ रही थी।

उस वक्त कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्होंने इससे अलग क्रांतिकारी रास्ते को चुना, जिनमें से एक थे रामप्रसाद बिस्मिल। 19 साल की उम्र में ही बिस्मिल क्रांति के रास्ते पर चल दिए।

उनका जन्म 11 जून, 1897 को यूपी के शाहजहांपुर में हुआ था। बिस्मिल न सिर्फ महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी थे बल्कि वे एक बेहतरीन कवि, शायर, इतिहासकार और साहित्यकार भी थे। बिस्मिल उर्दू और हिंदी दोनों में कविता लिखते थे।

उन्होंने ऐसा करके अंग्रेजों द्वारा उर्दू-हिंदी को लेकर हिंदू-मुस्लिम के बीच खाई भी पैदा कर दी थी उसे भरने का काम किया।

बिस्मिल अजीमाबादी द्वारा लिखी गई कविता ‘’सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है‘’ को हँसते-हँसते गुनगुनाते हुए फांसी पर चढ़ जाने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी रामप्रसाद बिस्मिल का आज जन्मदिन है।

जब बात हो बिस्मिल की हो और सबसे प्यारे दोस्त अशफाकउल्ला खां का जिक्र न हो यह मुमकिन नहीं है।

ब्रिटिश सरकार द्वारा हिन्दू और मुसलामानों के बीच दरार पैदा की जा रही थी। हिंदू और मुसलमान एक दूसरे को संदेह की नजर से देखने लगे थे।

तब भी मुसलमानों से उनकी देशभक्ति के सबूत मांगे जाते थे। तब बिस्मिल और अशफाक दोनों की जोड़ी ने हिन्दू और मुस्लिम समुदाय को एकता का सन्देश दिया।

इन दोनों की दोस्ती बहुत खास थी। अपनी आत्मकथा में एक घटना का उल्लेख करते हुए बिस्मिल लिखते हैं ‘पास खड़े भाई-बंधुओं को आश्‍चर्य था कि ‘राम’, ‘राम’ कहता है। कहते कि ‘अल्लाह, अल्लाह’ करो, पर तुम्हारी ‘राम’, ‘राम’ की रट थी!

उस समय किसी मित्र का आगमन हुआ, जो ‘राम’ के भेद को जानते थे। तुरंत मैं बुलाया गया। मुझसे मिलने पर तुम्हें शांति हुई, तब सब लोग ‘राम-राम’ के भेद को समझे!’

अपनी आत्मकथा में अशफाकुल्लाह खान का उदाहरण देते हुए वह कहते हैं, ‘ हिंदू-मुस्लिम एकता ही हम लोगों की यादगार और अंतिम इच्छा है, चाहे वह कितनी ही मुश्किल के बाद और संघर्ष करके क्यों न मिले।

 

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