Wednesday , September 26 2018

भारतीय जनता पार्टी, मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन और इनके मुख्यालय का अफसाना

कुछ दिन पहले दिल्ली में लुटियन बंगला जोन के बाहर दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नए मुख्यालय का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि पार्टी के हर कार्यकर्ता को यह सोचना चाहिए कि यह उसका कार्यालय है। 1.70 लाख वर्ग फुट से जमीन पर इसका निर्माण हुआ है और दुनिया में किसी अन्य पार्टी की तुलना में यह बड़ा कार्यालय है।

नवाब महमूद नवाज़ खान किलेदार ने हैदराबाद के निजाम नवाब मीर उस्मान अली खान की सलाह पर उलमा-ए-मशायकीन की उपस्थिति में 1927 में एमआईएम पार्टी का गठन किया था और 12 नवंबर, 1927 को नवाब महमूद नवाज़ खान के घर पर पहली बैठक आयोजित की गई थी। 1938 में बहादुर यार जंग को एमआईएम का ‘अध्यक्ष’ चुना गया जिसका ‘सांस्कृतिक’ और धार्मिक घोषणा पत्र था।

 1944 में बहादुर यार जंग की मृत्यु के बाद कासिम रिज़वी को नेता के रूप में चुना गया। 1948 में पुलिस कार्रवाई के कारण रिजवी को गिरफ्तार कर लिया गया और एक दशक बाद 1979 में इस शर्त पर छोड़ा गया कि वह पाकिस्तान में स्थानांतरित हो जाएं। भारत छोड़ने के कुछ दिन पहले रिजवी और अन्य एमआईएम नेताओं ने एक वकील के निवास पर बैठक बुलायी ताकि कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखा जा सके।

डेक्कन क्रोनिकल के एक लेख में इतिहासकार मोहम्मद नूरुद्दीन खान लिखते हैं, कि अब्दुल वाघ वाहिद ओवैसी (असदुद्दीन के दादा) उस समय मजलिस से जुड़े नहीं थे और वह उस बैठक में उपस्थित लोगों में सबसे कम उम्र के थे। खान का कहना है कि रिजवी ने इस बैठक में खुलासा किया था कि वह पाकिस्तान के लिए रवाना हो रहे हैं और मजलिस की कमान संभालने की बात रखी। इस पर अब्दुल वाहिद ओवैसी था आगे आये और संगठन का नेतृत्व करने के लिए तैयार हुए। दिलचस्प है उस समय अब्दुल वाहिद ओवैसी कहीं भी एमआईएम से जुड़े नहीं थे।

अब्दुल वाहिद ने पार्टी में एआई या अखिल भारतीय को जोड़ा। एमआईएम की स्थापना 1927 में हुई लेकिन 1940 के दशक में अखिल भारतीय मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) का मुख्यालय नवाब बहादुर यार जंग और उसकी पत्नी के निजी संपत्ति के साथ बनाया गया था। धन की कमी का सामना करते हुए उन्हें दारुस्सलाम के निर्माण के लिए दान के लिए समुदाय से अपील करना पड़ता था।

यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई थी और इसके पहले राष्ट्रपति डब्ल्यू सी बेनर्जी थे और मोतीलाल नेहरू 1919 में अध्यक्ष बने। इसी प्रकार मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमिन की स्थापना 1927 में हैदराबाद में नवाब बहादुर जंग ने की थी और अब्दुल वाहिद ओवैसी ने 1958 में इसे संभाला था। अब कांग्रेस और एमआईएम दोनों पार्टियां परिवारों में बदल गई हैं। यहाँ द्रविड़ सिद्धांत काम करता है।

आज एआईएमआईएम अपनी 60 वीं वर्षगांठ मना रहा है लेकिन एमआईएम की वेबसाइट का कहना है कि मजलिस की स्थापना 1920 के दशक के अंत में हुई थी और लगभग एक दशक की निष्क्रियता के बाद मजलिस को 1958 में मौलवी अब्दुल वाहिद ओवैसी ने पुनर्जीवित किया था। तो क्या ओवैसी एमआईएम की 60 वीं वर्षगांठ मना रहे हैं? वास्तव में अब ओवैसी अपने संस्थापकों के बिना एमआईएम के इतिहास को दोबारा लिखने की कोशिश कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं 1958 में अब्दुल वाहिद ओवैसी ने एमआईएम की स्थापना की थी।

ओवैसी भाई अपने संस्थापकों और दारुस्सलाम को कोई भी क्रेडिट दिए बिना एमआईएम को सभी क्रेडिट देने की कोशिश कर रहे हैं। टोपी और शेरवानी पहनकर भाषणों में कुरानी आयातों का हवाला देने से कोई ईमानदार नहीं बना सकता। समुदाय की संपत्तियों पर कब्जा करना, लोगों की जमीन हथियाने से बड़ा पाप है। भाजपा और आरएसएस लोग तथाकथित ‘नकीब-ए-मिल्लत’ की तुलना में अपनी विचारधारा के प्रति अधिक ईमानदार और प्रतिबद्ध हैं।

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