Friday , December 15 2017

भ्रष्टाचार को लेकर दोहरा रवैया अपनाती है भाजपा

भारतीय जनता पार्टी (BJP) कांग्रेस पर आरोप लगाती रही है कि कांग्रेस अपने लम्बे शासनकाल के दौरान भ्रष्टाचार से देश को अंदर से खोखला कर दिया है। हां इस आरोप के अपने-अपने मायने और मान्यताएं हो हो सकते हैं। लेकिन क्या खुद भाजपा भ्रष्टाचार को लेकर जो कुछ कर और कह रही है वह तो कांग्रेस पर उसके आरोप से भी कहीं ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि भाजपा तो भ्रष्टाचार के समूचे अस्तित्व को ही मजाक बना कर रख दिया है।

ममता बनर्जी के करीबी रहे और तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मुकुल रॉय बीजेपी में शामिल हुए ये वही मुकुल रॉय जिनका नाम दो बड़े भ्रष्टाचार मामलों से सामने आचुका है आखिर यह मजाक नहीं तो और क्या है कि जिस तृणमूल कांग्रेस नेता मुकुल राय को पश्चिम बंगाल की तमाम जनसभाओं में मंच से मोदी और अमित शाह ‘भ्रष्टों का सरताज’ कहते रहे हैं जिस मुकुल रॉय के दामन पर अब भी शारदा चिटफंड घोटाले के दाग हैं अभी सीबीआई  ने क्लीन चिट नहीं दिया है उन्हीं मुकुल राय को गले लगाकर पार्टी में शामिल करते हुए भाजपा, भ्रष्टाचार को लेकर देश को आखिर क्या सन्देश देना चाहती है ? शायद यही वजह है भाजपा ने मुकुल राय को सिर्फ पार्टी भर में नहीं शामिल किया बल्कि आने वाले दिनों में मुकुल राय ही पश्चिम बंगाल में भाजपा  का मुख्य चेहरा होंगे। इसीलिये भाजपा के दिग्गज नेता मुकुल को एक बेहद अनुभवी और पश्चिम बंगाल के लिए जरूरी नेता बताते रहे हैं।

सवाल  ये है आखिर भ्रष्टाचार को लेकर भाजपा अपनी किस सोच और गंभीरता का परिचय दे रही है? क्या तमाम भ्रष्टाचार के आरोपियों को चुन-चुनकर पार्टी में शामिल करने के बाद भी भाजपा के नेता के मुह से सुचिता और नैतिकता की बात अच्छी लगती है? क्या प्रधानमंत्री या भाजपा के पास कोई जादू है जिस से रॉय के अतीत को धोया जा सकता है? शारदा घोटाले के बाद हुए स्टिंग आपरेशन (जिसमें कई टीएमसी नेता घूस लेते कैमरे में धरे गए थे) में भी मुकुल राय का नाम आया था जिस पर सीबीआई  ने उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज किया था इसके अलावा रॉय प्रवर्तन निदेशालय की जांच के दायरे में भी आए थे। बावजूद इस सबके अब वह पाक साफ़ हो गए और Y क्लास सिक्यूरिटी का आनंद ले रहे हैं

भाजपा के भ्रष्टाचार को लेकर यह रवैया एक अकेले मुकुल रॉय के मामले में ही नहीं अपनाया बल्कि हर उस नेता के संबंध में जाहिर किया है जिसे उसने अपने फायदे के लिए साथ मिलाया है। चाहे वह नीतीश कुमार रहे हों, चाहे नारायण राणे रहे हों और चाहे संचार घोटाले के जनक पंडित सुखराम हों। पिछले 15 अक्टूबर को जब सुखराम के बेटे अनिल शर्मा अपने पूरे कुनबे के साथ भाजपा में शामिल हो गए तो वही सुखराम मंडी विधानसभा के गौरव और देश में संचार क्रांति के पुरोधा बन गए। भाजपा में सुखराम के परिवार के शामिल होते ही वे तमाम मुद्दे गायब हो गए जिन मुद्दों को लेकर भाजपा ने कभी संसद में हंगामा किया था।
इससे क्या मतलब निकलता है यही कि भाजपा के भ्रष्टाचार को लेकर दोहरे ही नहीं बल्कि बहुत किस्म के मापदंड अपनाती है। सुखराम के मामले में भाजपा के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा है कि सुखराम के खिलाफ मामले बहुत पुराने हैं। मतलब भ्रष्टाचार पुराना हो जाए तो वह भ्रष्टाचार नहीं रह जाता?

अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार की सफलताओं का गाना गाते हुए अक्सर दावा करते हैं कि साढ़े तीन सालों में हमारे विरोधी भी हम पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा पाए हैं।

यह बात सरासर झूठ है। मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले, वसुंधरा राजे के ब्रिटिश एफिडेविट वाला मामला (जिसमें उन्होंने भगोड़े ललित मोदी को बचाया), गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉरपोरेशन स्कैम, सहारा-बिरला डायरी जिसमें नरेंद्र मोदी का भी नाम है। इतना ही नहीं केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरन रिजीजू पर अपने भाई गोबोई रिजीजू के जरिये पूर्वोत्तर में सम्पन्न एक बांध निर्माण मे भी घोटाले का आरोप हैं। ये सब क्या हैं?

भाजपा को भले भ्रम हो कि वह बहुत सफाई से देश की आम जनता की आँखों में धूल झोंक देगी लेकिन हकीकत में यह संभव नहीं है।
आम लोग अब भाजपा के दिग्गज नेताओं के मुंह से अब भ्रष्टाचार उखाड़ फेंकने की बातें सुनकर मुस्कुराने लगते हैं वो अंग्रेजी में एक कहावत है कि आप कुछ लोगों को कुछ समय तक तो बेवक़ुफ़ बना सकते हैं लेकिन सभी लोगों को हमेशा के लिए नहीं बेवक़ुफ़ नहीं बना सकते।

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