मॉब लिंचिंग को सिर्फ राजनीतिक मान लेना एक अधूरा सच! अपराधी खुद भी हैं पीड़ित

मॉब लिंचिंग को सिर्फ राजनीतिक मान लेना एक अधूरा सच! अपराधी खुद भी हैं पीड़ित

झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले में हुई मॉब लिंचिंग और जिंदगी की भीख मांग रहे तबरेज अंसारी से ‘जय श्रीराम’ और ‘जय हनुमान’ के नारे लगवाने की घटना ने देश में फिर से बेचैनी पैदा की है। दिल्ली के नजदीक दादरी में 2015 में हुई अखलाक की मॉब लिंचिंग के बाद से ऐसी घटनाएं बार-बार देखने को मिली हैं। लेकिन लोकसभा चुनावों के दौरान इन हमलों पर जरूर एक विराम लगा था। इससे यही बात साबित होती है कि इन हमलों का ताल्लुक राजनीति से है। राजनीतिक तंत्र चुनाव में व्यस्त था तो ऐसी घटनाएं रुक गई थीं लेकिन इन घटनाओं को सिर्फ राजनीतिक मान लेना एक अधूरे सच को मानने जैसा होगा। इस अपराध में शामिल लोगों की पृष्ठभूमि और उनके परिवेश पर नजर डालें तो यह साफ दिखाई देगा कि वे भी सताए हुए और पीड़ित लोग हैं। मौजूदा अर्थतंत्र उन्हें लगातार हाशिए पर धकेल रहा है और उनका सामाजिक ताना-बाना इतना कमजोर हो गया है कि सांप्रदायिक नफरत की बयार को रोकने में असमर्थ है। धर्म और अस्मिता की राजनीति करने वालों के लिए वे सबसे आसान शिकार हैं।

दादरी से लेकर खरसावां तक लोगों के हाशिए पर जाने की कहानी को समझना आसान नहीं है। इसे न तो सरलीकृत जातीय समझ से समझा जा सकता है और न सरलीकृत वर्गीय समझ से। हाशिए पर जाने वालों में बड़ी जातियों से लेकर पिछड़े समाज तक सभी तरह के लोग हैं। मुसलमान और दलित पहले से हाशिए पर हैं, इसलिए उनके और किनारे हो जाने का पता उन्हें भी नहीं लगता, बाकी कैसे जानेंगे? वे समाज में पनप रहे आक्रोश का पहला निशाना बन जाते हैं क्योंकि हर लिहाज से उनकी स्थिति कमजोर है। दबंग जातियों के हाशिए पर जाने का सबसे बड़ा उदाहरण नौकरियों में आरक्षण के लिए महाराष्ट में मराठों और गुजरात में पटेलों का आंदोलन है। हाल तक अर्थ और राजनीति के तंत्र पर कब्जा रखने वाले ये दोनों समूह अंदर से इतना हिल गए कि उन्हें सड़कों पर उतरना पड़ा। उदारीकरण की अर्थव्यवस्था ने उन्हें पैदल कर दिया है।

दादरी के अपराधी दबंग जाति से हैं। उनके पड़ोस में एनटीपीसी का बड़ा प्लांट है और चारों ओर उद्योगों का जाल, लेकिन उनके पास रोजगार नहीं है। खेती के लिए जमीन नहीं रह गई है और पुराने धंधे बेकार हो चुके हैं। राजनीति में पिछड़ों के उभार ने उनकी हैसियत कम कर दी है। स्कूल-कॉलेजों से लेकर रोजगार की दौड़ में भी पिछड़ रहे इन युवकों को यह समझाना एकदम आसान है कि सारे फसाद की जड़ मुसलमान हैं क्योंकि वे ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं और गाय की हत्या कर हिंदुओं की धार्मिक भावना को चोट पहुंचाते हैं। उनके पास इस झूठ को परखने के लिए जरूरी जानकारी नहीं है और विषमता वाली सामाजिक बनावट को सच मान लेने की वजह से वे इससे पैदा होने वाले अन्याय को सही मानते हैं। उन्हें जातीय श्रेष्ठता और धार्मिक उच्चता के विचार ही अपनी खोई हैसियत को वापस लाने में मददगार दिखाई देते हैं। बरसों तक सांप्रदायिक सौहार्द के साथ रहने वाले लोगों के वहशीपन को देख कर अखलाक का परिवार दंग रह गया क्योंकि नफरत की इस आग को उसने कभी देखा नहीं था।

खरसावां की कहानी भी यही है। इसके सारे आरोपी स्कूल की पढ़ाई छोड़ने वाले युवक हैं। खेती और उससे जुड़े धंधों वाले परिवार से आने वाले इन युवकों के सामने कोई भविष्य नहीं है। एकफसली खेती और बांस की टोकरी बनाने जैसे धंधों से अब आजीविका नहीं चलती है और दिहाड़ी का काम पाने के लिए अब संघर्ष करना पड़ता है। यह स्थिति इसके बावजूद है कि पूरा इलाका खदान और उद्योगों से भरा है। झारखंड में फैले उद्योग संसाधन छीनते हैं, लेकिन रोजगार नहीं देते हैं। पहले तो सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों ने यहां के संसाधन लूटे, अब उदारीकरण के तहत इसे लूटने की खुली छूट है। अकेले चांडिल डैम ने सैकड़ों किसान परिवारों को विस्थापित किया था और उन्ह्रें मछली मारने के व्यवसाय का लालच दिया गया जो कभी पूरा नहीं हुआ।

संसाधनों की लूट की इस कहानी के साथ चलने वाली कई उपकथाएं भी हैं। इसमें भाषा का लोप और सामाजिक ताने-बाने के टूटने के अनेक दर्दनाक किस्से शामिल हैं। खरसावां में बांस की टोकरी बनाने का काम खत्म होने के साथ-साथ माहली भाषा भी मर रही है जो यहां के आदिवासी बोलते हैं। अपराधियों में महतो युवकों के साथ कई माहली आदिवासी युवक भी हैं। झारखंड में शिबू सोरेन ने अस्मिता और हक की एक बड़ी लड़ाई लड़ी थी जिसे गरीब गैर-आदिवसियों का भी भरपूर समर्थन मिला था। लेकिन परिवारवाद और भ्रष्टाचार में लिपटे झारखंड मुक्ति मोर्चा को शासन-तंत्र ने पचा लिया। एक सामाजिक क्रांति मंजिल तक पहुंचने में नाकाम रही।

बंदूक के जरिए मुक्ति का रास्ता दिखाने वाले माओवादी हजारों की जान लेकर भी कहीं पहुंच नहीं पाए। मुख्यधारा में सक्रिय सामाजिक न्याय की पार्टियां के पास जातियों को इकट्ठा करने के अलावा कोई राजनीति नहीं बची है। सांप्रदायिकता से लड़ने का उनका दावा भी खोखला साबित हो रहा है। नतीजा है कि राजनीति एक बड़े मरुस्थल में बदलती जा रही है। इसमें धर्म एक मरीचिका का काम कर रही है। इसमें हैरत की कोई बात नहीं है कि अंधकारमय भविष्य वाले युवा ‘जय श्रीराम’ का नारा लगा रहे हैं और अपनी हताशा पर एक फर्जी शौर्य का आवरण चढ़ा रहे हैं। शौर्य की इस कथा को गढ़ने में हिंदुत्ववादी संगठन बरसों से लगे हैं। उन्हें अब जाकर इन्हें स्वीकार कराने में सफलता मिली है। यह सिर्फ दादरी या सरायकेला की कहानी नहीं है। यह पूरे देश की कहानी है जिसमें अपराधी खुद एक बड़े अन्याय का शिकार हैं।

लेखकः अनिल सिन्हा के व्यक्त विचार अपने हैं

Top Stories