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जामा मस्जिद: यहां इफ़्तार के वक़्त कोई भूखा नहीं रहता

माह-ए-रमज़ान की एक और शाम है, सूरज ढलने में करीब पांच मिनट पहले 28 साल के मोहम्मद उजैर दिल्ली की जामा मस्जिद में इफ्तार की तैयारियों में जुटे हुए हैं। इस मस्जिद में इफ्तार के दौरान कोई भूखा नहीं लौटता। मस्जिद में इफ्तार के समय फल और खाने-पीने की तमाम चीज़े उपलब्ध रहती है।

रमजान के दौरान यहां रोजाना 200 लोगों का इफ्तार तैयार किया जाता है। जुमे के दिन 500 से 1000 लोगों का इफ्तार तैयार किया जाता है। दस्तरख्वान पर 300 से अधिक लोग बैठते हैं जिन्हें एक केला, पकौड़ा और एक गिलास शिकंजी दी जाती है।

उज़ैर का परिवार मस्जिद में इफ्तार की मेजबानी करता है। उज़ैर के अनुसार शुरुआती दिनों में हम 200 लोगों के लिए इफ्तारी तैयार करते हैं। इसके बाद हर हफ्ते तादाद में इज़ाफ़ा होता रहता हैं। महीने के आखिरी शुक्रवार को हम करीब 1,000 लोगों के लिए इफ्तार की व्यवस्था करते है। हम आजादपुर मंडी से थोक में फल खरीदते हैं।

उजैर को एक हदीस ने रोज़दारों को इफ्तार कराने के लिए प्रेरित किया। इसी तरह हजारों मुस्लिम दुनिया भर में बड़े पैमाने पर इफ्तार कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं। मध्य पूर्व में संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन की संस्थाएं, समितियां, संगठन और यहां तक ​​कि सरकारी निकाय भी बड़े पैमाने पर इफ्तार कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।

भारत में पड़ोसी मस्जिदों में इफ्तार का खाना भेजना आम बात है। इससे आप इफ्तार के दौरान किसी भी मस्जिद के पास से गुजर रहे हैं तो बस मस्जिद में प्रवेश करें और अपना रोजा खोल लें।

पुरानी दिल्ली के निवासी मेहताब राही कहते हैं कि कई जरूरतमंद लोग और यात्री भी मस्जिदों को इफ्तार के लिए आते हैं। इलाके के निवासियों के अलावा मस्जिदों के प्रबंधन में शामिल लोगों की ओर से भोजन की पर्याप्त आपूर्ति होती है।

जामा मस्जिद के मुख्य प्रवेश द्वार के ठीक बाद रोजेदारों के लिए भोजन कराया जा रहा है। 26 साल के नूरुद्दीन का दावा है कि उनके दादा हाजी हबीबुद्दीन ने मस्जिद में इस परम्परा को शुरू किया था। नूरुद्दीन अपने परिवार से छह से 10 लोगों के साथ हर महीने 200 लोगों को खाना खाते हैं।

वो कहते हैं सामूहिक इफ्तार करना मुसलमान भाइयों में एकजुटता का भाव प्रदान करता है। साथ ही लोगों के साथ संबंध बनाने का यह एक तरीका है। कुछ परिवारों के लिए जामा मस्जिद में इफ्तार एक पिकनिक के जैसा है।

एक आईटी पेशेवर और नोएडा के निवासी तरुण शर्मा पास के करीम रेस्तरां में अक्सर आते हैं, लेकिन यह उनके परिवार की जामा मस्जिद की पहली यात्रा है।

शर्मा को यह दिलचस्प लगा कि सामूहिक तौर पर मुस्लिम इफ्तार कर रहे हैं। रमजान मुसलमानों के लिए आस्था का प्रतीक है, क्योंकि यह वही माह है जिसमें क़ुरान नाज़िल हुआ था।

यह माना जाता है कि रमज़ान के महीने में जन्नत के दरवाजे खुल जाते हैं और जहन्नुम के दरवाजे बंद हो जाते हैं जिसके पीछे बुरी ताकतों को कैद कर दिया जाता है।

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