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अवध के नवाब प्रिंस अली रज़ा की दिल्ली में गुमनाम मौत, बड़ी दिलचस्प है उनकी कहानी

नई दिल्ली। दिल्ली के दक्षिण रिज़ के बीहड़ों में छुपा ‘मालचा महल’ जिसमे पिछले 28 सालो से अवध राजघराने के प्रिंस अली रजा ‘साइरस’ और राजकुमारी ‘सकीना महल’ रह रहे थे, करीब एक महीने पहले प्रिंस अली रजा (साइरस) का निधन हुआ।

यह खबर करीब एक महीने बाद सामने आई। अली रजा की मौत इसलिए भी रहस्यमयी है क्योंकि वे और राजकुमारी सकीना महल कई दशकों से खंडहर हो चुके ‘मालचा महल’ में रह रहे थे।

पहले इनके साथ इनकी माँ ‘विलायत महल’ भी रहा करती थी जिन्होंने 10 सितंबर 1993 को आत्महत्या कर ली थी। चाणक्यपुरी थाने के पुलिस अधिकारियों से इस बारे में बात की, तब प्रिंस की मौत की पुष्टि हुई। प्रिंस का अंतिम संस्कार दिल्ली गेट पर हुआ था।

इस महल तक जाने का रास्ता सरदार पटेल मार्ग से जाता है। लेकिन इस महल में अंदर जाने की इज़ाज़त किसी को नहीं है। उस महल तक पहुंचने के लिए एक मात्र रास्तेल पर लगा है लोहे का ग्रिल, जिस पर हल्की-सी आहट होते ही कुत्ते भौंकना शुरु कर देते हैं।

चारों ओर कंटीली तार के बाड़े से घिरे उस महल के प्रवेश द्वार पर लगे पत्थर पर लिखा है, “रूलर्स ऑफ अवध: ‘प्रिंसेस विलायत महल”।

सकीना और सायरस हमेशा काले कपड़े पहन कर रहते थे। दोनों ने अपनी मां की तरह ही साधारण होने से दूरी बनाए रखी। दरवाजे पर एक बोर्ड लगा था, “अंदर शिकारी कुत्ते हैं, घुसने वालों को गोली मारी जा सकती है।” कुछ समय पहले राजकुमारी सकीना की मौत हो गई।

इस हवेली में न कोई खिड़की थी, न बिजली न पानी। सिर्फ एक दरवाजा और एक गलियारा जिससे बाहर से रौशनी और थोड़ी बहुत हवा आती थी। कई दशक पहले एक टेलीफोन जरूर लगा था। यह भी बाद में खराब हो गया।

प्रिंस के पास सिर्फ एक साइकल हुआ करती थी। प्रिंस रजा अली के पास कुछ पुश्तैनी ज्वैलरी बची थी। जिसे बेचकर वह कुत्तों के लिए हड्डियां और खाना लेकर आते थे। हफ्ते में एक बार बाजार से खाने का सामान ले आते थे।

खाना देसी घी में बनता था। अब महल में पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ है। सामान बिखरा है। फ्लोर पर पत्र और बिजनेस कार्ड पड़े हैं। महल में कोई पलंग नहीं था और वे कालीन में सोते थे।

अब लगभग खंडहर हो चुके इस महल का निर्माण आज से 700 साल पूर्व फ़िरोज़ शाह तुगलक ने कराया था। यह महल उसकी शिकारगाह था। पहाड़ी पर बने इस महल में करीब 10 खिड़की और दरवाज़े है।

इस चौकोर रूप के महल के हर ओर 6 यानी कुल 24 मेहराब (आर्च) हैं। मरम्मत न होने के चलते इनमें से अब 3 आर्च ही सलामत हैं, जिनमें राजकुमार और राजकुमारी रह रहे हैं।

इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने से पूर्व सभी राजा – महाराजाओं को सरकार की तरफ से पेंशन मिला करती थी, पर जब इंदिरा गांधी, प्रधानमन्त्री बनी तो उन्होंने पेंशन बंद कर दी। इससे उन राजा – महाराजाओं के तो कुछ फर्क नहीं पढ़ा जिनके पास या तो पुश्तैनी दौलत थी या फिर कमाई के अन्य स्रोत थे।

लेकिन जिनके पास दोनों में से कुछ नहीं था उनके सामने संकट खड़ा हो गया। इनमे से ही एक थी विलायत महल, जिनके पति कि मृत्यु हो चुकी थी और कमाई का कोई स्रोत नहीं था। कोई उपाय न देखकर विलायत महल ने सन 1975 में अपने दोनों बच्चे, रियाज व सकीना सहित,  जब वह महेंगे फारसी कालीन,  उनकी बहन और कुछ कुत्तों को लेकर दिल्ली रेलवे स्टेशन के पहले दर्ज़े के वेटिंग रूम में डेरा डाला दिया। बेगम अड़ गईं कि जब तक भारत सरकार उनके परिवार के बलिदान को मान्यता नहीं देती है वो अपने लोगों के साथ यहीं रहेंगी। उनका दावा था कि उनके परिवार ने 1857 में ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ भड़के विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाई थी. विलायत महल का दावा था कि वह अवध के नवाब वाजिद अली शाह की परपोती है। इसलिए उन्हें पूरा सम्मान मिलना चाहिए।

आखिरकार इंदिरा गांधी सरकार ने 1980 में मालचा महल उन्हें रहने के लिए दे दिया। वो दिन और विलायत महल का आखिरी दिन, वे इस महल से नहीं निकली। विलायत ने केंद्र की 500 रुपए बतौर पेंशन की पेशकश को ठुकरा दिया था।

तय हुआ कि महल देने से पहले उसकी मरम्मत कराई जाएगी, पर इंदिरा गांधी की मौत के बाद यह काम रह गया। 1985 में उन्होंने रजा और सकीना के साथ महल में रहना शुरू किया। यह दिल्ली के रिज क्षेत्र के जंगल में है.

महल के अंदर अगर जाएज़ा लें तो वहां एक बड़ा भगोना इंटों के बने चूल्हे पर रखा था। शायद इसी में खाना बनाया जाता होगा। पास में ही मेज पर एक ट्रांजिस्टर रखा था साथ में लाल रंग का एक टेलीफोन भी था। इसी फोन के जरिए प्रिंस अली रजा अपने जानने वालों से संपर्क किया करते थे। महल के बड़े हॉल में पुराना फ्रिज भी मिला। इसका इस्तेमाल भी अलमारी के तौर पर किया जाता था। महल की दीवारों पर अब भी रानी विलायत महल की फोटो लगी हैं। वहीं, दूसरी ओर टेबल पर पुराने कप-प्लेट और बर्तन रखे हैं।

महल में पहले चांदी की टेबल और खाने के बर्तन भी चांदी के थे। कीमती जूलरी भी थी। यह सामान हटाया जा चुका है। दरअसल, कुछ साल पहले बावरिया गिरोह ने राजकुमार के सभी कुत्तों को जहर देकर मार डाला था और महल में चोरी की थी।

कुछ समय पहले तक महल में ग्रेटडन, जर्मन शेपर्ड और नेपोलियन जैसी विदेशी नस्ल के कुत्ते थे। लेकिन अब महल में एक भी कुत्ता नहीं है शायद यहां कुत्तों को खिलाने के लिए भी कुछ नहीं बचा था।

बाहर बिखरे सामान में प्रिंस अली राजा के पासपोर्ट की कुछ फोटो कॉपियां पड़ी हैं। पासपोर्ट में लंदन और मिस्र के वीजा लगे थे। 1981 में प्रिंस ने लंदन की यात्रा की थी। पासपोर्ट की कॉपी में प्रिंस की उम्र 17 दिसंबर 1958 है। राजकुमार, ब्रिटेन या विदेशों में होने वाली शादी-समारोह में शामिल होने जाते थे। उनके घराने के ज्यादातर रिश्तेदार ब्रिटेन में रहते हैं। महल के अंदर बिखरे कागजातों में कुछ पत्र भी मिले। यह विदेशों से भेजे गए थे। इनमें अवध की रानी और राजकुमारी लिखकर संबोधित किया गया है।

राजकुमारी सकीना और राजकुमार अली रजा की शादी बचपन में ही हो गई थी। यह जानकारी भी प्रिंस ने करीब दो साल पहले बातचीत में दी थी। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि शादी किसके साथ हुई थी। उन्होंने ये भी बताया था कि राजकुमारी सकीना महल ने ब्रिटिश टीचर्स से अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं की तालीम ली थी। दोनों की ही उम्र करीब 60 से 65 के आसपास रही होगी।

राजकुमारी सकीना महल ने अपनी मां बेगम विलायत महल पर एक किताब लिखी है। इसका नाम है ‘प्रिंसेस विलायत महल : अनसीन प्रेजंस’। यह बुक नीदरलैंड, फ्रांस और ब्रिटेन की लाइब्रेरी में मौजूद है। किताब में विलायत महल के जीवन के कई पहलुओं को उकेरा गया है।

1983 में विलायत महल ने हीरे कुचल कर खा लिए और आत्महत्या कर ली। 10 दिन तक उनकी लाश टेबल पर पड़ी रही। इस घटना से सकीना को बेहद सदमा लगा, जिस कारण उन्होंने काफी साल बाहर के किसी शख्स से बात तक नहीं की।

Pic: The Indian Express
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