Thursday , December 14 2017

‘योगी सरकार’ अराजकता तत्वों के साथ है या आम इंसान के साथ?- अभिसार शर्मा

सोच रहा था वीडियो ब्लॉग करूँ…मगर मन नहीं किया। फिर भी खुद को लिखने से नहीं रोक पाया। आज अखबारों में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की सूचना और प्रसारण मंत्रालय के नाम खत देखा।

एक निर्वाचित, ताक़तवर, सशक्त सरकार लिखती है, क्योंकि राज्य सरकार एक मुस्लिम त्यौहार और मेयर चुनाव की मतगणना में व्यस्त होगी,लिहाज़ा संजय लीला भंसाली की फिल्म की रिलीज़ को मुल्तवी किया जाए। कानून व्यवस्था की दुहाई देते हुए उत्तरप्रदेश सरकार लिखती है और गौर कीजिये ,

“कई सामाजिक ,सांस्कृतिक और अन्य संस्थाओं ने ये कहकर इसके ट्रेलर की रिलीज़ के खिलाफ़ प्रदर्शन किया था क्योंकि इसमें रानी पद्मावती को “घूमर” नृत्य करते हुए दिखाया गया है, अलाउद्दीन खिलजी के साथ प्रेम प्रसंग दिखाया गया है, जिसका ज़िक्र इतिहास की किसी किताब में नहीं है ”

एक सरकार ,हिंसा करने वाली किसी संस्था का ज़िक्र कर रही है , अपनी बेबसी और नाकामी को जायज़ ठहराने के लिए। मलिक मोहम्मद जायसी की इस प्रेम कथा को इतिहास बताना एक अलग विषय है ,क्योंकि इतिहास मे रानी पद्मिनी का कहीं ज़िक्र नहीं है ,सिवाय जायसी की इस अमर कथा के सिवाय।

मुद्दा वो है ही नहीं। मुद्दा ये है के अपनी मजबूरी की इस दास्ताँ में उत्तर प्रदेश सरकार लगातार धमकी देने वाली संस्थाओं का पक्ष रखती है ,यहाँ तक के उनके तर्कों को भी सही ठहराने का प्रयास करती है. योगी सरकार का कहना है के ,

“तथ्यों और सकारात्मक सन्देश देने वाली फ़िल्में जहाँ समाज को प्रेरित , सही रास्ता दिखाती हैं, वहीँ गलत ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित फ़िल्में ,समाज और देश में नफरत और व्यवस्था के लिए चुनौती पैदा करती हैं ”

यानी के योगीजी ने बगैर फिल्म देखे मान ही लिया है के ‘पद्मावती’ झूठ पर आधारित फिल्म है और इससे समाज में नफरत पैदा होगी।

गज़ब है , यानी के !

ये सरकार हिंसा फैलाने वाली संस्थाओं की हिमायती बनकर क्यों बोल रही है? मानता हूँ के केंद्र मंत्रियों से लेकर पार्टी के तमाम नेता पद्मावती फिल्म के खिलाफ झंडा बुलंद किये हुए हैं , मगर कम से कम, अपनी नाकामी और बेबसी के लिए तर्क सलीके से तो रखिये ?

अगर आप कानून व्यवस्था का हवाला देकर ये बात लिखते तो एक पल के लिए ठीक भी था। आप हिंसा मचाने वाली संस्थाओं के प्रवक्ता बन गए हैं?

आपकी यही बेबसी मुझे कुछ दिनों पहले लखनऊ में भी दिखाई दी थी ,जब ABVP और ‘हिन्दू युवा वाहिनी’ द्वारा लखनऊ ‘लिटररी फेस्टिवल’ में JNU छात्र कन्हैया के सत्र में हंगामा मचाने के बाद, आपने फेस्टिवल को ही रद्द कर दिया था। लखनऊ के इतिहास में पहली बार हुआ है ,जब एक साहित्यिक आयोजन को कुछ तत्वों की गुंडई के चलते रद्द किया गया हो।

एक हफ्ते के भीतर मिसालें साबित करती हैं के योगी सरकार की क्या प्राथमिकताएं हैं और वो किसके साथ खड़ी है? जब सरकार खुद बेबस और निरीह दिखाई देती हैं हिंसा के सामने, तो आप आम इंसान के साथ क्या खड़े होंगे? उसकी मिसाल हम गोरखपुर के BRD अस्पताल में देख चुके हैं।

जब बच्चें अब भी मर रहे हैं, मगर आपके पास हिमाचल प्रदेश चुनाव और गुजरात चुनाव जैसे ‘ज़्यादा ज़रूरी’ काम हैं। दिमागी बुखार से लगातार मर रहे बच्चों के लिए आपके आस कोई योजना नहीं है और आपसे कोई जवाब ही मांग रहा है। सुना है अब आप फरवरी से राम मंदिर के पांच महीने लम्बी यात्रा पर निकल रहे हैं।

उम्मीद करता हूँ , के कम से कम ऐसे ही राम राज्य आ जायेगा।

अब मेरी दो टूक।

१. सरकार को सिर्फ कथनी के ज़रिये ही नहीं ,बल्कि अपनी करनी के ज़रिये भी आम इंसान की सुरक्षा ,उसकी हिफाज़त में खड़े रहते हुए दिखाई देना चाहिए।

२. हिंसा की धमकी देने वाली संस्थाएं किसी भी सूरत में सहानुभूति की हक़दार नहीं हो सकती ,खासकर जब वो सार्वजनिक स्थलों में अराजकता करती दिख रही हैं। क्योंकि ऐसी जगहों में औरतें ,बच्चे , बुज़ुर्ग आते हैं। उनकी हिफाज़त से बड़ा सरकार का कोई दायित्व नहीं हो सकता।

३. सरकार को सिर्फ और सिर्फ तथ्यों पर बात करनी चाहिए। पद्मावती की दास्ताँ एक कथा है. इतिहास में इसका कहीं ज़िक्र नहीं है। ऐसे में इस फिल्म के खिलाफ खड़े लोगों के तर्कों को आप एक आधिकारिक खत का हिस्सा नहीं बना सकते।

४.उनके साथ संवाद ज़रूर कीजिये ,उन्हें समझाइये। मगर प्रदेश का अमन ,मुट्ठी भर लोगों की ज़िद के भेंट नहीं चढ़ सकती।

और सबसे बड़ी बात। जनता। ये सवाल हमें करने होंगे। अपनी सरकार और उसकी नाकामी को लेकर उनकी जवाबदेही तय करनी होगी। ये सोचना होगा के ये कैसे माहौल को बढ़ावा दिया जा रहा है ,जहाँ चंद मुट्ठी भर लोग हमारे जीने के तरीके को बदल सकते हैं और सरकार न सिर्फ तमाशा देखती हैं ,बल्कि उसे बढ़ावा भी देती हैं।

मगर कैसा के मैं कई बार कह चूका हूँ। मस्त रहिये भक्ति के इस चरस काल मे!

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