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फैज अहमद फैज: लोकतंत्र का शायर

मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ जिनका नाम युवा पीढ़ियों ने पहली बार सुना होगा। एक ऐसे शायर जिनकी शायरी सुनकर लोग मदहोश हुआ करते थे। 13 फ़रवरी 1911 को जन्मे फैज अहमद फैज के मृत्यु के 30 वर्ष बाद 2014 में विशाल भारद्वाज ने राजनीतिक स्वर लिए हुए एक मनोरंजन प्रधान फिल्म बनाई-‘हैदर’। जिसमे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की निचे दी हुई ग़ज़ल को शामिल किया गया था।

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

क़फ़स उदास है, यारो सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

कभी तो सुब्ह तेरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले

बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल ग़रीब सही
तुम्हारे नाम पे आयेंगे, ग़मगुसार चले

जो हम पे गुज़री सो गुज़री है शब-ए-हिज़्रां
हमारे अश्क़ तेरी आक़बत संवार चले

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूं की तलब
गिरह में लेके गरेबां का तार-तार चले

मुक़ाम ‘फ़ैज़’ कोई राह में जंचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले

भारत की एक बड़ी युवा जनसंख्या जो पहली बार ऐसे शख्सियत का नाम सुना, ये वह पीढ़ी थी जिसने मेंहदी हसन की आवाज़ में फ़ैज़ को नहीं सुना था। वह फ़ैज़ जिसे पढ़ा जा सकता था, गाया जा सकता था और अपने दोस्तों से साझा किया जा सकता था।

29 जनवरी, 1954 को मांटगोमरी जेल में रहते हुए फ़ैज़ ने यह सब लिखा था। यह उनकी आदत थी कि वे लिखें और जैसा हर दौर में सत्ता अपने भीतर तानाशाही विकसित करती है, फ़ैज़ अपने दौर में वैसा ही किया। उन्हें जेल में डाला गया। जेल में उन्होंने फिर लिखा। उन्हें फिर जेल में डाला गया।

जिन लोगों ने राजनीति विज्ञान पढ़ा होगा वे जानते हैं कि लोकतंत्र के द्वारा चुनी गई सरकारें भी अपने अंदर ऐसी संरचनाएं विकसित कर लेती हैं कि वे अपने ही नागरिकों का दमन करने लगती हैं।
जब राजनीति के जानकार ज्यार्जियो अगम्बेन ने यह बात कही तो भारत के कई और विद्वान इस ओर उन्मुख होकर देखने का प्रयास किया कि आखिर इंदिरा गांधी ने 1975 में इमरजेंसी क्यों लगा दी थी?

1974 के आसपास की रेलवे की हड़तालों और विद्यार्थियों ने आख़िर मांगा ही क्या था? वे अपने काम का दाम मांग रहे थे, जिसको लेकर इंदिरा गाधी ने इमरजेंसी लगा दी! जो बोलता था, उसे चुप करा दिया गया, चाहे अख़बार हो या आदमी। इस पर शायर तो बोलेगा ही। इस दौर के भारत में फ़ैज़ को ख़ूब गाया गया, पढ़ा गया। पाकिस्तानी हुक़ूमत की निगाह में तो वे 1950 के दशक से ही चढ़ गए थे. लग रहा था कि उन्हें फांसी की सज़ा दी जाएगी। लेकिन उन्होंने जनता से हुक़ूमत की शिकायत की। उन्हें जनता से ही आशा थी।

दूसरी तरफ यह बात सरकारों को भी पता है। वे अपनी जनता को पहले पुचकारते हैं। उसके लिए योजनाएं लाते हैं, अगर मान गई तो मान गई, नहीं तो दमन का पुराना तरीक़ा नये क़ानूनों के मार्फ़त ले आया जाता है। इसमें सबसे पहले अभिव्यक्ति की आज़ादी को पाबंद किया जाता है।

वर्तमान भाजपा सरकार के समय अभिव्यक्ति की आज़ादी के बारे में काफ़ी बात हुई है। कहा जाता है कि भाजपा को इस मुद्दे पर बिहार का विधानसभा चुनाव गंवाना पड़ा, लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी को थोड़ा व्यापक संदर्भ में देखें तो यह लोकतंत्र की परीक्षा लेने वाला विचार है।

यहीं पर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ जरूरी कवि हो जाते हैं जिनकी कविता पूरी दुनिया की लोकतांत्रिक सरकारों से जन-हितैषी होने की अपेक्षा करती है। इसी के साथ वे जनता को रौशन ख्याल भी करते हैं। फ़ैज़ के लिए बोलना ज़िंदा होना है।

पेश हैं फैज अहमद फैज के गजल के कुछ अंश

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल कि जां अब तक तेरी है

बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बां की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले

ये वो सहर तो नहीं जिसकी आरज़ू लेकर
चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल
कहीं तो जाके रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़मे-दिल

निसार मैं तेरी गलियों के ए वतन, कि जहां
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जां बचा के चले

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